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कांड के बाद से परिवार ने गोकशी त्याग दी : अब्दुल

3 वर्ष पहले
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लखनऊ के रहने वाले अदनान अब्दुल बाली बनारस से आए नरिंदर कपूर के साथ।

भास्कर न्यूज | अमृतसर

जिंदगी और सोच को बदलने के लिए सिर्फ एक घटना की काफी होती है और अगर वह घटना मुल्क और उसकी इज्जत से जुड़ी हुई हो तो इंसान किसी भी हद तक जा सकता है। 13 अप्रैल 1919 के दिन हुए जलियांवाला बाग कांड के बाद ऐसे ही हदों को पार कर गए थे लखनऊ के रहने वाले मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली। उन्होंने बरतानवी हुकूमत के खिलाफ परचम बुलंद तो किया ही बल्कि अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद करने के लिए फतवा भी जारी कर दिया था। उन्हीं मौलाना की चौथी पीढ़ी के (नाती) अदनान अब्दुल बाली फिरंगी महली शुक्रवार को बाग में शहीदों को श्रद्धांजलि भेंट किया। मौलाना की देश भक्ति से प्रेरित बाली ने जलियांवाला बाग व आजादी की अन्य लड़ाइयों पर शोध करने के लिए नौकरी तक छोड़ दी है। अब वह शहर-शहर जाकर शोध कर रहे हैं। अमृतसर दौरे के दौरान वह खालसा कॉलेज लाइब्रेरी भी जाएंगे। उन्होंने बताया कि जलियांवाला बाग कांड के छह महीने बाद मौलाना साहिब बाग में आए थे। उनकी उर्दू लिखित आत्मकथा दिखाते हुए वह बताते हैं कि इस घटना का उन पर इतना असर पड़ा कि उन्होंने लखनऊ में जाते ही हिंदू-मुसलमानों को अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद किया और अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद (लड़ाई) रखने के लिए जनता के नाम फतवा जारी कर दिया। हिंदुओं की भावनाओं के मद्देनजर गोकशी पर रोक लगी, जिसका पालन उनका परिवार आज भी करता है।

अपने परिवार के नाम के आगे फिरंगी महली लगाए जाने बारे वह कहते हैं कि फिरंगी महल लखनऊ में विक्टोरिया रोड और चौक के बीच स्थित है। औरंगजेब के दौर में इसका मालिक यूरोपियन (फिरंगी) था। महल पर विदेशी मालिकाना होने के कारण औरंगजेब ने शाही फरमान के बाद जब्त कर लिया, जो कालांतर में उनके पूर्वजों के पास आ गई। बाली बताते हैं कि 1920 में महात्मा गांधी ने भी इसी फिरंगी महल में कुछ दिन बिताए और वह कमरा जहां वे रुके थे उनकी याद में समर्पित किया गया है। इस दौरान उन्होंने मौलवी साहिब को हिंदुओं और मुसलमानों का संयुक्त नेता घोषित किया था।

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