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रमजान में खुल जाते हैं जन्नत के दरवाजे, हर दुआ होती है कबूल

3 वर्ष पहले
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रमजान का पवित्र महीना शुरू होने वाला है। अगर बुद्धवार को चाँद का दीदार हुआ तो गुरुवार से रोजा शुरू होने की उम्मीद है। इसके साथ हीं बुधवार की रात मस्जिदों में तराबीह भी शुरू हो जाएगी। इधर रमजान को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय के परिवारों में तैयारियां शुरू कर दी गयी है। जबकि मस्जिदों में तराबीह पढ़ने और पढ़ाने की व्यवस्था में लोग जुट गए हैं। हर त्योहार मनाने के पीछे कोई वजह होती है।

क्यों मनाया जाता है माहे रमजान के पर्व: इस्लाम मे रमजान के महीने को सबसे पाक महीना माना जाता है। रमजान के महीने में कुरान नाजिल हुआ था। माना जाता है कि रमजान के महीने में जन्नत के दरवाजे खुल जाते हैं। अल्लाह रोजेदार और इबादत करने वालो की दुआ कूबुल करता है और इस पवित्र महीने में गुनाहों से बख्शीश मिलती है। मुसलमानों के लिए रमजान महीने की अहमियत इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि इन्हीं दिनों पैगम्बर हजरत मोहम्मद साहब के जरिए अल्लाह की अहम किताब ‘कुरान शरीफ’ (नाजिल) जमीन पर उतरी थी। इसलिए मुसलमान ज्यादातर वक्त इबादत-तिलावत में गुजारते हैं। मुसलमान रमजान के महीने में गरीबों और जरूरतमंद लोगों को दान देते हैं।

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सेहरी खाने से शुरू होता है रोजा

रोजा रखने के लिए सवेरे उठकर खाया जाता है। इसे सेहरी कहते हैं। सेहरी के बाद से सूरज ढलने तक भूखे-प्यासे रहते हैं। सूरज ढलने से पहले कुछ खाने या पीने से रोजा टूट जाता है। रोजे के दौरान खाने-पीने के साथ गुस्सा करने और किसी का बुरा चाहने की भी मनाही है।

कैसा खोला जाता है रोजा

शाम को सूरज ढलने पर आमतौर पर खजूर खाकर या पानी पीकर रोजा खोलते हैं। रोजा खोलने को इफ्तार कहते हैं। इस्लाम धर्म के धार्मिक गुरुओं की माने तो इफ्तार के वक्त सच्चे मन से जो दुआ मांगी जाती है वो कूबुल होती है।

रोजा चरित्र निर्माण का सुनहरा अवसर: मोहसिन

अररिया |
आजकल पूरे मानव समाज में उपभोक्ता अपसंस्कृति के मोहपाश में फंसकर चरित्रहीनता के गर्त में गिरती जा रही है।

एक बड़ी जनसंख्या को पतन के इस गर्त में गिरने से बचाने का सर्वोत्तम साधन तक़वा व रोजा है। यह बातें सेवानिवृत प्रधानाध्यापक मो. मोहसिन ने कही है। उन्होंने कहा कि रोजे से आदमी का आत्मिक और चारित्रिक उत्थान होता है। रोजा से एक सुंदर सुव्यवस्थित और चरित्रवान समाज का निर्माण होता है।

रोजे से छूट किसे है

बच्चों, बुजुर्गों, मुसाफिरों, गर्भवती महिलाओं और बीमारी की हालत में रोजे से छूट है। जो लोग रोजा नहीं रखते उन्हें रोजेदार के सामने खाने से मनाही है।लेकिन कोई बिना कोई ठोस वजह से रोजा नहीं रखते हैं तो अल्लाह उन्हें मुआफ़ नहीं करेगा।

ईद के चांद के साथ रमजान का अंत होता है। रमजान की खुशी में ईद मनाई जाती है। ईद का अर्थ ही ‘खुशी का दिन’ है। मुसलमानों के लिए ईद-उल-फित्र त्योहार अलग ही खुशी लेकर आता है।

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