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पदाधिकारी समेत मात्र 3 लोग चला रहे विभाग

3 वर्ष पहले
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जिला मुख्यालय में एक ऐसा भी विभाग है जिसका मुख्य दरवाजा समय पर तो खुल जाता है। लेकिन कार्यालय का अंग कक्ष बंद रहता है। कार्यालय आने वाले लोग परेशान हो जाते हैं। यह महज संयोग ही समझा जा सकता है कि कार्यालय में मौजूद किसी कर्मी से मुलाकात हो जाए। कुछ ऐसा ही हाल गुरुवार को जिला गव्य विकास कार्यालय का दिखा। समय ठीक 11 बजे अमित कुमार साह रामपुर मोहनपुर के रहने वाले और रूपेश कुमार अड़राहा फारबिसगंज के रहने वाले पहुंचता है और कह उठता है कि साहब इस कार्यालय में कोई कर्मी बैठता है या नहीं। यह पता ही नहीं चलता। फोन से संपर्क करने पर प्लांट ऑपरेटर दिलीप कुमार चौधरी कहते हैं कि मैं पूर्णिया आया हुआ हूं। साहब से फाइल पर दस्तखत कराने। यह पूछे जाने पर कार्यालय तो खुला हुआ है। लेकिन कार्यालय कक्ष बंद है। आखिर क्यों? उन्होंने कहा कार्यायल पहुंचकर आपसे बात करेंगे। लगभग तीन बजे दिलीप कुमार चौधरी कार्यालय आते हैं। उन्होंने पूछने पर कहा कि इस कार्यालय में स्वीकृत पद तो 15 हैं लेकिन जिला गव्य अधिकारी, डेयरी फील्ड ऑफिसर और मुझे लेकर मात्र तीन लोग कार्यरत हैं। दिलीप ने बताया कि पिछले आठ दिनो से मैं अकेला काम कर रहा हुं। जिला गव्य विकास पदाधिकारी तीन जिला के प्रभार में है। डेयरी फील्ड ऑफिसर अशोक कुमार यादव कभी कभी आते हैं। इसलिए कार्यालय में सन्नाटा पसरा रहता है।

बंद पड़ा गब्य विकास कार्यालय।

डेयरी उद्यमिता एवं समग्र गव्य विकास योजना के तहत चलती है योजना

जिले में डेयरी उद्यमिता एवं समग्र गब्य विकास योजना के तहत सिडुल कास्ट एवं सिडुल ट्राइफ्स के लोगों के अलावा दुग्ध उत्पादन से आर्थिक उन्नति करने वाले आवेदकों को ऐसी हालत में परेशान होना लाजिमी है। जब कार्यालय में कर्मी ही न हो तो आखिर कैसे इन योजनाओं को धरातल पर उतारा जा सकेगा। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। हालांकि मौजूद कर्मी दिलीप कुमार चौधरी का कहना माने तो जिला स्तर पर इसकी एक कमेटी होती है। दोनों योजनाओ के तहत जितने आवेदन पड़ते हैं उसकी जांच पड़ताल के बाद कमेटी द्वारा स्वीकृत या अस्वीकृत किया जाता है। जिन आवेदकों का आवेदन स्वीकृत हो जाता है। लक्ष्य के हिसाब से उसे बैंक भेज दिया जाता है। डेयरी उद्यमिता में नवार्ड और केंद्र सरकार से 50 प्रतिशत सब्सिडी लाभ दिया जाता है।

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