सिटी रिपोर्टर | औरंगाबाद सदर
शहर के गौरव मार्केट में शनिवार की देर शाम संस्था साहित्य सम्मेलन के द्वारा बतकही कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसकी अध्यक्षता डॉ रामाशीष सिंह ने की। साहित्यकि गतिविधियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। बतकही की दसवीं कड़ी का आयोजन छायावाद के सौ वर्ष पूरे होने पर किया गया था। इसमें छायावाद के प्रसिद्ध रचनाकार जयशंकर प्रसाद की चर्चित कहानी गुंडा का पाठ किया गया। मुकुल अकेला ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि उज्जवल रंजन ने कहानी पाठ किया। कुमार वीरेन्द्र ने कहा कि 1918 से 1936 तक की प्रमुख काव्य प्रवृत्ति को छायावाद कहा जाता है। छायावाद शब्द को चर्चा में लाने का श्रेय मुकुट धर पांडेय को है, जिन्होंने जबलपुर से निकलने वाली पत्रिका श्रीशारदा में 1920 में छायावाद पर चार निबंध लिखे थे। वैसे तो छायावाद मूलतः कविता का युग था लेकिन निराला, पंत, प्रसाद और महादेवी ने कविता के अलावा गद्य की अन्य विधाओं में भी खूब रचनाएं कीं। प्रेमचंद ने हंस पत्रिका का 1933 में जब काशी अंक निकाला तो उसमें प्रकाशनार्थ जयशंकर प्रसाद से एक ऐसी कहानी मांगी थी।
छायावाद के सौ साल पूरे होने पर गौरव मार्केट में ‘बतकही’ का आयोजन, जिलेभर के साहित्यकारों ने कार्यक्रम में लिया भाग
कार्यक्रम मंे उपस्थित लोग।
अगले माह बतकही की अगली कड़ी का होगा आयोजन | वक्ताओं ने बताया कि बतकही की अगली कड़ी का आयोजन अगले माह होगा। सर्वसम्मति से तीन जून को तिथि निर्धारित की गई है। उसमें जैनेन्द्र कुमार की कहानी ‘पाजेब’ का पाठ होगा। इसके बाद शिक्षक शिव नारायण सिंह, डॉ महेंद्र पांडेय, चन्द्र शेखर साहू ने कहा कि गुंडा कहानी में जो राष्ट्र प्रेम, भावनात्मक प्रेम है, वह निस्वार्थ है। प्रसाद की रचनाओं में ऐसे पात्र जीवंत हो उठते हैं। कई अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे।
सह चरित्र प्रधान कहानी है
समकालीन जवाबदेही के डॉ सुरेन्द्र प्रसाद मिश्र ने कहा कि यह चरित्र प्रधान कहानी है और इसका केंद्रीय पात्र नन्हकू सिंह अंग्रेज शासकों की नज़र में भले ही गुंडा हों, पर वह तो प्रेम और देश के लिए प्राणों का उत्सर्ग करता है। यह कहानी संवेदना के स्तर पर चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ के निकट जान पड़ती हैं। मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहने वाले नन्हकू सिंह को गुंडा कहना उचित नहीं जान पड़ता है। मिथिलेश मधुकर, देवेन्द्र दत्त मिश्र, त्रिभुवन सिंह, रामानुज पांडेय, धनंजय जयपुरी, शिवदेव पांडेय, प्रो रामाधार सिंह, प्रो शिवपूजन सिंह, डॉ विनोद कुमार सिंह, पुरुषोत्तम पाठक, डॉ रवीन्द्र कुमार, श्रीनिवास पाठक, अनिल कुमार सिंह, राम किशोर सिंह, डॉ काशीनाथ मिश्र, अनुज बेचैन, अर्जुन प्रसाद सिंह, जनार्दन जलज ने भी अपने विचार साझा किए।