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गंगापुर गांव के किसान मदन किशोर नौ एकड़ जमीन पर कर रहे हैं तरबूज की खेती

3 वर्ष पहले
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गंगापुर गांव के किसान मदन किशोर नौ एकड़ जमीन पर कर रहे हैं तरबूज की खेती

परंपरागत खेती की अपेक्षा किसानों को मिल रहा ज्यादा लाभ

सिटी रिपोर्टर | हसपुरा/दाउदनगर

आम तौर पर बोझ बनती जा रही पारंपरिक खेती से किसानों का अब धीरे-धीरे मोहभंग होने लगा है। अब किसान व्यवसायिक खेती पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। जिससे किसानों की मुश्किल भरी राह भी आसान हो रही है। इसकी बानगी दाउदनगर व हसपुरा प्रखंड के विभिन्न ग्रामीण इलाकों में देखने को मिल रही है। हसपुरा में जहां जर्मन कैप्सूल तरबूज की खेती हो रही है। वहीं दाउदनगर के सोन तटीय इलाके में भी तरबूज की खेती की जा रही है। तरबूज की खेती कर किसान आत्मनिर्भर बन रहे हैं। वहीं उन्हें आर्थिक रूप से काफी फायदा हो रहा है। इन किसानों को देख दूसरे गांव के किसान भी अब इस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। हसपुरा के गंगापुर गांव में उपजी जर्मन कैप्सूल तरबूज पटना बाजार में अपनी मिठास घोल रही है। सरकार के द्वारा भी व्यवसायिक खेती को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है। हालांकि किसानों को जितनी सुविधाएं सरकारी स्तर पर मिलनी चाहिए। उतना नहीं मिल पा रहा है। जिससे उन्हें पूंजी की जुगाड़ में थोड़ी समस्या भी झेलनी पड़ रही है।

हसपुरा प्रखंड के गंगापुर गांव में जर्मन कैप्सूल तरबूज की खेती की जा रही है। उक्त गांव के किसान मदन किशोर 9 एकड़ जमीन में तरबूज की खेती इस बार किए हैं। इससे उन्हें काफी फायदा मिला है। किसान मदन किशोर ने बताया कि जर्मनी से आईस सिग्मेंट तरबूज की बीज मंगवाकर वे इसकी खेती की है। एक एकड़ में 335 पौधे लगे हैं।

दाउदनगर के सोन तटीय इलाकों में भी कई किसान कर रहे तरबूज की खेती

हसपुरा में बंजर जमीन पर उगाई जा रही है जर्मन कैप्सूल तरबूज

तरबूज की खेती से आर्थिक रूप से काफी फायदा हो रहा किसानों को

दाउदनगर के सोन तटीय इलाके के खेतों से तरबूज को तोड़ते किसान।

एक पौधे से 3 से 5 किलो का उत्पादन

एक पौधा से 3 से 5 किलो तक का 5 से ज्यादा तरबूज उत्पादन हुआ है। पूरे 9 एकड़ में तीन हजार पौधे लगाए गए थे। एक एकड़ में तरबूज की खेती में लगभग 25 हजार रूपए का खर्च आता है। जिसमें बीज की कीमत 10 हजार, बुआई, सिंचाई व दवा में 15 हजार रूपए का खर्च है। एक एकड़ से लगभग शुद्ध मुनाफा 75 हजार से लेकर सवा लाख रूपए तक हो रही है। 50 क्विंटल तरबूज का उत्पादन हुआ है। जिससे उन्हें काफी फायदा मिला है।

पटना के बाजार में बिक रही है हसपुरा की तरबूज

गंगापुर गांव में उपजी जर्मन कैप्सूल तरबूज की सप्लाई पटना के बाजार में किया जा रहा है। किसान बताते हैं कि पटना के थोक व्यापारी गांव में पहुंचकर तरबूज की खरीदारी करते हैं। 6 से 7 रूपए किलो का दाम मिल रहा है। पहली तुड़ाई में 50 क्विंटल उत्पादन हुआ है। जिसकी सप्लाई भी कर दी गयी है। जर्मन आई सिग्मेंट कैप्सूल तरबूज काइ रंग की होती है और यह काफी मिठी भी होती है। जिसके कारण इसकी मांग बाजार में ज्यादा है। इससे किसानों को आर्थिक रूप से काफ लाभ हो रहा है।

दाउदनगर सोन तटीय इलाके में लीज पर जमीन लेकर किसान कर रहे हैं तरबूज की खेती

दाउदनगर सोन तटीय इलाके बालूगंज में किसान रंजीत महतो व सत्येन्द्र महतो लीज पर जमीन लेकर तरबूज की खेती किए हैं। जिससे उन्हें काफी फायदा हुआ है। लगभग सात कट्ठा जमीन पर तरबूज की खेती की गयी है। जिसपर उन्हें 50 हजार खर्च आया था। अब तक एक लाख 82 हजार रूपए की तरबूज वे लोग अब तक बेच चुके हैं। इसके अलावे अभी भी फल लगा हुआ है। यहां से तरबूज औरंगाबाद जिला के साथ-साथ झारखंड के रांची व पश्चिम बंगाल के कोलकाता भी भेजा जाता है।

किसान ने बताया परंपरागत खेती छोड़ी तो सुधरी आर्थिक स्थिति

किसान मदन किशोर ने बताया कि जिस जगह पर उनका जमीन है। वह बंजर था। बालू वाली जमीन होने के कारण परंपरागत फसले नहीं होती थी। जिसके कारण उन्हें आर्थिक रूप से काफी नुकसान हुआ था। जिससे उनके सामने भूखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। इसके बाद उन्होंने परंपरागत खेती को छोड़ औषधीय खेती की। जिससे कुछ उन्हें फायदा हुआ। इसके बाद अपने बंजर जमीन में आंवला का बगीचा लगाया। आवला, आम व अमरूद के पौधे लगाए। इसका भी फायदा उनको मिला। इन लगाए गए तीनों पौधो से लगभग एक से डेढ़ लाख की कमाई सीजन में हो जाती है। कुछ माह पहले अखबार में एक दिन आरा जिला के एक किसान के बारे में तरबूज की खेती की खबर पढ़ी। जिससे उनकी प्रेरणा जगी और उन्होंने तरबूज की खेती करने का भी निर्णय लिया। इसको लेकर वे प्रखंड कृषि कार्यालय के कृषि समन्वयक राजू कुमार सिंह, सुरेन्द्र कुमार सिंह सहित कृषि वैज्ञानिकों से मिले और इसकी चर्चा की। लोगों की सलाह पर उन्होंने जर्मनी से तरबूज की बीज मंगायी और उसकी खेती की। हालांकि किसान का कहना है कि खेती करने में दो माह की देरी हुई थी। जनवरी माह में ही इसकी खेती करनी चाहिए थी। लेकिन वे मार्च माह में बुआई किए थे।

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