सरकारी अस्पताल में महिला डॉक्टर के नहीं होने से आती है परेशानी
सरकारी अस्पताल में करीब दो साल से महिला डॉक्टर नहीं हैं। इससे महिला रोगियों को अपनी जांच एवं उपचार में भारी परेशानी उठाना पड़ती है। शासन की कई महिला कल्याणकारी योजनाओं पर भी इसका असर पड़ता है। पूर्व में तत्कालीन जिला प्रभारी एवं स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा को भी कई बार इस समस्या से अवगत कराया गया था, किंतु वे भी यह समस्या दूर नहीं कर सके। बाद में उनका प्रभार भी बदल गया। बदनावर क्षेत्र में निजी अस्पतालों में भी महिला चिकित्सक नहीं है। जहां महिलाएं अपनी बीमारी का इलाज करा सके। उन्हें अक्सर बड़नगर के साथ ही धार, रतलाम, उज्जैन व इंदौर तक जाना पड़ता है। बीमार महिलाएं बड़ी संख्या में प्रतिदिन सरकारी अस्पताल के अलावा नीम हकीमों के यहां जाती हैं। वे छोटी मोटी बीमारी का तो इलाज करवा लेती हैं, किंतु महिलाएं अपनी कई गंभीर शारीरिक बीमारियांे को दूर करने के लिए न तो पुरूष चिकित्सकों से जांच करवा पाती है, न ही उपचार लेती है। पुलिस केस व दुष्कर्म, छेड़छाड़ आदि के मामलों में मेडिकल कराने के लिए भी पुलिस को जिला मुख्यालय जाना पड़ता है। महिलाओं की शंकास्पद मौत होने पर डाॅक्टरों की पैनल से पोस्टमार्टम कराने के लिए महिला चिकित्सकों को धार से बुलाना पड़ता है। अस्पताल में सप्ताह में दो तीन दिन के लिए भी लेडी डाॅक्टर की नियुक्ति होने से महिलाओं को काफी राहत मिल सकती है।