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देश की सीमाएं अशांत-असुरक्षित, हमें शक्ति की खोज, संचय और प्रदर्शन को बनाना होगा विदेश नीति का आधार: डॉ. मिश्रा

3 वर्ष पहले
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बहल. जीडीसी में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में मुख्यातिथि को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित करते डॉ. एसके सिन्हा।

बहल | जीडीसी मेमोरियल कॉलेज में राष्ट्रीय सेमिनार में वैदेशिक मामलों, रक्षा विशेषज्ञों व शोधार्थियों ने शिरकत की। कार्यक्रम के मुख्यातिथि पूर्व कुलपति प्रो. लोकेश शेखावत थे और अध्यक्षता बीआरसीएम एजुकेशन सोसायटी के निदेशक डॉ. एसके सिन्हा ने की। प्रो. लोकेश शेखावत ने बताया कि प्रारम्भिक भारतीय नेतृत्व के द्वारा चीनी इतिहास व मनोवृति की अवहेलना करते हुए अप्रासंगिक नीति का निर्माण किया। इसके दुष्परिणाम हम पिछले 58 वर्षों से भुगत रहे हैं। एक पत्रिका के सम्पादक सुशील शर्मा ने बताया कि स्वतंत्रता पश्चात देश की प्रतिरक्षा के प्रति हमारे नीति-नियंता पूर्णत: उदासीन रहे। डॉ. आईएस चहल ने विदेश नीति के क्रियान्वयन पर पड़ने वाले वोट बैंक के प्रभाव की निंदा की। डॉ. एसके सिन्हा ने बताया कि डोकलाम विवाद में सर्वप्रथम भारत ने यह सिद्ध किया कि शान्ति शक्ति से ही स्थापित होती है। प्राचार्य व राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक डॉ. एसके मिश्रा ने बताया कि देश की सीमाएं अशांत व असुरक्षित हैं। इसलिए राष्ट्रीय सुरक्षा संरक्षण के लिए हमें शक्ति की खोज, शक्ति संचय व शक्ति प्रदर्शन को अपनी विदेश नीति का मूल आधार बनाना होगा। इस अवसर पर प्रो. सुरेन्द्र कुमार, डॉ. प्रवीन कुमार गौड़, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, अभिनव कौशिक, डॉ. अरिन्दम घोष, मनीष कुमार, पंकज दावां, अशोक कुमार, विनोद बिश्नोई, देवीलाल, राहुल कौशिक अादि उपस्थित थे।

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