भास्कर न्यूज| मेहंदीपुर बालाजी।
इस बार पुरूषोत्तम मास 11 साल एंव गंगा दशहरा 20 वर्ष बाद अदभुत संयोग से आए हैं। ऐसे में अधिक मास व गंगा दशहरे का महत्व बढ गया है। जिससे इस मास में किए गए दान -पुन्य व धार्थिक कार्य अनन्त गुणा फलदायी हैं। बालाजी मंदिर ट्रस्ट इसका सम्पूर्ण पुन्च फल ले रहा है। अनेकों धार्मिक आयोजनों के साथ श्रद्धालुओं के लिए मीठे जल की प्याऊ भी लगाई हैं। वहीं बालिकाओं को वस्त्र वितरण सहित का कार्य नियमित जारी है।
श्री बालाजी महाराज घाटा मेहंदीपुर ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत श्री किशोरपुरी जी महाराज ने अधिक मास के बारे में बताया कि श्रीमद्भगवत महा पुराण एवम हरिवंश पुराण के अनुसार जिस चन्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नही होती है। वह मास अधिमास कहलाता है। दूसरे अर्थ में यदि चन्द्रमास के दोनों ही पक्षों में सूर्य किसी भी राशि में प्रवेश नहीं करता, तब वह संक्रमण रहित मास वर्ष की मास गणना में अधिक हो जाता है। लोकभाषा में इसे अधिकमास, मलमास या पुरूषोत्तम कहा जाता है। इस वर्ष अधिक मास 16 मई से 13 जून 2018 तक चलेगा। महंत महाराज ने कहा कि प्रत्येक राशि, नक्षत्र, करण व चैत्रादि बारह मासों के स्वामी देवता हैं। परन्तु मलमास का कोई स्वामी व देवता नही है। इसलिए देव कार्य, शुभ कार्य एवं पितृ कार्य इस मास में वर्जित माने गये है। इस मास में केवल ईश्वर के निमित्त व्रत, दान, हवन, पूजा, ध्यान आदि करने का विधान है। ऐसा करने से पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य प्राप्त होता है। महंत किशोरपुरी महाराज ने बताया कि धर्म सिंधु, हरिवंश पुराण एवं देवीभागवत के अनुसार श्री लक्ष्मी नारायण यज्ञ के साथ पूजा पाठ करने चाहिए। वहीं कासी की थाली में शक्कर, आम का फल, स्वर्ण आभूषण, वस्त्र दक्षिणा, वेद पुराणों के साथ ब्राह्मण को भेंट करने से अनन्त जन्मो के पापों का नाश होकर बैकुंठ की प्राप्ति होती है । इन्होंने कहा कि अधिक मास में पति - प|ी सहित ब्राह्मण जोड़ों को दान देना चाहिए। ये ब्राहमण जोड़े लक्ष्मी नारायण का स्वरूप होते हैं। इन्हें सत्तू , मौसम के फल, पंखा, पीतल का लोटा, केला, नारियल , खरबूजा, आम सहित ब्राह्मण दम्पति को स्वर्णाभूषण यज्ञ के विष्णु स्वरूप ब्राह्मणों को दान करना चाहिए। वैसे तो पुरषोत्तम मास हर साढे तीन साल मे आता है। लेकिन अबकी बार 11 बर्षों बाद दुर्लभ योग बना है।
इस बार गंगा दशहरे पर 20 वर्ष बाद वह अदभुत संयोग प्राप्त हो रहा है, जो गंगा के अवतरण के समय संयोग बना था। ऐसे में इस बार का गंगा दशहरा धर्म कर्म की दृष्टी से विशेष फलदायी रहेगा। उन्होंने बताया कि गंगा दशहरा 20 वर्ष बाद 24 मई को है। जो एक अद्भुत संयोग है। इस दिन सायं 7 बजकर 50 मिनट पर हस्त नक्षत्र आने से गंगा दशहरा के पर्व का फल दस गुना हो गया। क्योकि हस्त नक्षत्र दसमी तिथि को गंगा मैया का अवतरण हुआ था। और गंगा दशहरा के दिन मां गंगा का बैकुंठ धाम से धरती पर शिव जी की जटाओं के माध्यम से धरती पर आई थी। इसलिए गंगा दशहरा का पर्व काफी महत्वपूर्ण है। इस पावन अवसर पर गंगा स्नान या अपने नहाने के पानी मे गंगाजल डाल कर स्नान करें। दान करें। शिव जी का अभिषेक व पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन 1-ज्येष्ठ 2-शुक्ला 3-दसमी4- हस्त 5-नक्षत्र, 6-वृषभ का सूर्य , 7-कन्या का चंद्रमा , 8-गर नामक करण 9-,तैतिल नाम का योग ,10 आनन्द नामक दस योग एक साथ पड़ने से पिछले किये हुए दस पापों का नाश होता है। गंगा अवतरण पर 10 योग बने थे। जो कि क्रमशः ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, गुरुवार, हस्त नक्षत्र, व्यतीपात योग, गर और आनन्द योग, कन्या राशि में चंद्रमा तथा वृष राशि में सूर्य। इन दस योगों से युक्त समय में अवतीर्ण हुई गंगा का स्नान दस पापों का हरण करता है। व्यास जी के मतानुसार जो व्यक्ति “ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:” मन्त्र का एक बार जप करके गंगाजल से स्नान करें। ऐसा करके वह गंगा दसहरा के दिन भगवान विष्णु के चरणों का संयोग प्राप्त कर लेता है। यह मंत्र पदम् पुराण के सृष्टि खण्ड के गंगा माहात्म्य-45 में वर्णित है।
मेहंदीपुर बालाजी.बालिकाओं को वस्त्र भेंट करते महंत किशोर पुरी महाराज।
भास्कर न्यूज| मेहंदीपुर बालाजी।
इस बार पुरूषोत्तम मास 11 साल एंव गंगा दशहरा 20 वर्ष बाद अदभुत संयोग से आए हैं। ऐसे में अधिक मास व गंगा दशहरे का महत्व बढ गया है। जिससे इस मास में किए गए दान -पुन्य व धार्थिक कार्य अनन्त गुणा फलदायी हैं। बालाजी मंदिर ट्रस्ट इसका सम्पूर्ण पुन्च फल ले रहा है। अनेकों धार्मिक आयोजनों के साथ श्रद्धालुओं के लिए मीठे जल की प्याऊ भी लगाई हैं। वहीं बालिकाओं को वस्त्र वितरण सहित का कार्य नियमित जारी है।
श्री बालाजी महाराज घाटा मेहंदीपुर ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत श्री किशोरपुरी जी महाराज ने अधिक मास के बारे में बताया कि श्रीमद्भगवत महा पुराण एवम हरिवंश पुराण के अनुसार जिस चन्द्रमास में सूर्य की संक्रान्ति नही होती है। वह मास अधिमास कहलाता है। दूसरे अर्थ में यदि चन्द्रमास के दोनों ही पक्षों में सूर्य किसी भी राशि में प्रवेश नहीं करता, तब वह संक्रमण रहित मास वर्ष की मास गणना में अधिक हो जाता है। लोकभाषा में इसे अधिकमास, मलमास या पुरूषोत्तम कहा जाता है। इस वर्ष अधिक मास 16 मई से 13 जून 2018 तक चलेगा। महंत महाराज ने कहा कि प्रत्येक राशि, नक्षत्र, करण व चैत्रादि बारह मासों के स्वामी देवता हैं। परन्तु मलमास का कोई स्वामी व देवता नही है। इसलिए देव कार्य, शुभ कार्य एवं पितृ कार्य इस मास में वर्जित माने गये है। इस मास में केवल ईश्वर के निमित्त व्रत, दान, हवन, पूजा, ध्यान आदि करने का विधान है। ऐसा करने से पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य प्राप्त होता है। महंत किशोरपुरी महाराज ने बताया कि धर्म सिंधु, हरिवंश पुराण एवं देवीभागवत के अनुसार श्री लक्ष्मी नारायण यज्ञ के साथ पूजा पाठ करने चाहिए। वहीं कासी की थाली में शक्कर, आम का फल, स्वर्ण आभूषण, वस्त्र दक्षिणा, वेद पुराणों के साथ ब्राह्मण को भेंट करने से अनन्त जन्मो के पापों का नाश होकर बैकुंठ की प्राप्ति होती है । इन्होंने कहा कि अधिक मास में पति - प|ी सहित ब्राह्मण जोड़ों को दान देना चाहिए। ये ब्राहमण जोड़े लक्ष्मी नारायण का स्वरूप होते हैं। इन्हें सत्तू , मौसम के फल, पंखा, पीतल का लोटा, केला, नारियल , खरबूजा, आम सहित ब्राह्मण दम्पति को स्वर्णाभूषण यज्ञ के विष्णु स्वरूप ब्राह्मणों को दान करना चाहिए। वैसे तो पुरषोत्तम मास हर साढे तीन साल मे आता है। लेकिन अबकी बार 11 बर्षों बाद दुर्लभ योग बना है।
इस बार गंगा दशहरे पर 20 वर्ष बाद वह अदभुत संयोग प्राप्त हो रहा है, जो गंगा के अवतरण के समय संयोग बना था। ऐसे में इस बार का गंगा दशहरा धर्म कर्म की दृष्टी से विशेष फलदायी रहेगा। उन्होंने बताया कि गंगा दशहरा 20 वर्ष बाद 24 मई को है। जो एक अद्भुत संयोग है। इस दिन सायं 7 बजकर 50 मिनट पर हस्त नक्षत्र आने से गंगा दशहरा के पर्व का फल दस गुना हो गया। क्योकि हस्त नक्षत्र दसमी तिथि को गंगा मैया का अवतरण हुआ था। और गंगा दशहरा के दिन मां गंगा का बैकुंठ धाम से धरती पर शिव जी की जटाओं के माध्यम से धरती पर आई थी। इसलिए गंगा दशहरा का पर्व काफी महत्वपूर्ण है। इस पावन अवसर पर गंगा स्नान या अपने नहाने के पानी मे गंगाजल डाल कर स्नान करें। दान करें। शिव जी का अभिषेक व पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन 1-ज्येष्ठ 2-शुक्ला 3-दसमी4- हस्त 5-नक्षत्र, 6-वृषभ का सूर्य , 7-कन्या का चंद्रमा , 8-गर नामक करण 9-,तैतिल नाम का योग ,10 आनन्द नामक दस योग एक साथ पड़ने से पिछले किये हुए दस पापों का नाश होता है। गंगा अवतरण पर 10 योग बने थे। जो कि क्रमशः ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, गुरुवार, हस्त नक्षत्र, व्यतीपात योग, गर और आनन्द योग, कन्या राशि में चंद्रमा तथा वृष राशि में सूर्य। इन दस योगों से युक्त समय में अवतीर्ण हुई गंगा का स्नान दस पापों का हरण करता है। व्यास जी के मतानुसार जो व्यक्ति “ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नम:” मन्त्र का एक बार जप करके गंगाजल से स्नान करें। ऐसा करके वह गंगा दसहरा के दिन भगवान विष्णु के चरणों का संयोग प्राप्त कर लेता है। यह मंत्र पदम् पुराण के सृष्टि खण्ड के गंगा माहात्म्य-45 में वर्णित है।