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8 साल पुरानी एंबुलेंस हो गई खटारा, घायलों को लाते आधे रास्ते में ही हो जाती है खराब

3 वर्ष पहले
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जो संजीवनी वाहन दूसरों की जान बचाने के लिए है, वह आज खुद बीमार है। शासन की लापरवाही व देरी के चलते एक साल से प्रस्ताव के बाद भी कबाड़ एंबुलेंस नहीं बदले गए। आपात सुविधा में मरीजों को राहत देने के बजाय जब ये गाड़ियां आधे रास्ते में खराब हो जाए तो जान आफत में पड़ जाती है।

भास्कर ने जिले के अलग-अलग अस्पतालों की 108 एंबुलेंस की जांच की तो यह हकीकत सामने आई। सबसे ज्यादा कबाड़ स्थिति घोटिया व डौंडीलोहारा के एंबुलेंस की है। खास बात ये है कि जिले में चार अस्पतालों में चल रही गाड़ियां बस्तर पासिंग की है। जिन्हें 2011 में सीएम ने बस्तर व रायपुर में योजना को लाॅन्च करने के लिए दिया था। एक साल बाद योजना को सभी जिले में शुरू किया गया। बालोद जिले में नई गाड़ी देने के बजाय फोर्स कंपनी की बस्तर में एक साल चल चुकी गाड़ियों को दिया गया है। सीने पर झटका देने वाली मशीन (एईडी) भी कई साल से बंद हैं। इसे सुधरने कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

स्वास्थ्य विभाग की डायरेक्टर रानू साहू ने बताया कि पुरानी एंबुलेंस को बदलने के लिए प्रस्ताव भेजा गया है। मंजूरी मिलते ही बदल देंगे।



डौंडीलोहारा की संजीवनी 108, जो पुरानी होने के कारण आए दिन हो जाती है खराब।

संजीवनी वाहन में खराबी से ऐसे पड़ी जान आफत में

25 घायल यात्रियों को लेने के लिए गई 108 खराब हो गई

पिछले महीने लोहारा राजनांदगांव मार्ग पर अछोली के पास एक बस पलटने से 25 यात्री घायल हुए थे। लोहारा से गाड़ी पहुंची। पांच छह गंभीर मरीजों को 108 में ले जाने के लिए बैठाया गया। लेकिन गाड़ी चालू नहीं हुई। आनन-फानन में अर्जुन्दा से 108 बुलाई गई। आने में देरी होगी इसलिए कई घायलों को पुलिस की गाड़ी से अस्पताल पहुंचाया गया।

केस-1

इसलिए अटका है गाडि़यों को बदलने का प्रस्ताव

एंबुलेंस चलाने वाली जीवीके कंपनी ने स्वास्थ्य विभाग को प्रस्ताव भेजा, लेकिन जिम्मेदारों ने काफी समय के बाद फाइल की जांच की। स्वास्थ्य मंत्रालय ने रिपोर्ट बनाने में देर की और बहुत समय बाद केंद्र सरकार को फाइल भेजी। राज्य सरकार की आेर से देर से फाइल पहुंचने पर फंड जारी नहीं किया गया।

संजीवनी 108 खराब हुई तो मरीज को बस से भेजना पड़ा

20 दिन पहले मंगचुआ में एक व्यक्ति बाइक से गिरकर घायल हो गया था। उसे अस्पताल लाने गई संजीवनी वापसी में आधे रस्ते में खराब हो गई। घायल की जान बचाने के लिए उसे यात्री बस से अस्पताल भेजा गया। गौरतलब है कि बस लोहारा पहुंचने के बाद 102 से घायल को अस्पताल पहुंचाया गया।

केस-2

सायरन नहीं बजता, हेडलाइट भी ठीक से नहीं जलती, पुरानी गाड़ियों में एसी तक नहीं

लोहारा सहित अन्य अस्पतालों के एंबुलेंस सात साल पुरानी होने व 2.50 लाख किमी की जगह 3.50 लाख किमी से ज्यादा चल जाने के कारण कई तरह की दिक्कत आती है। कई एंबुलेंस में सायरन नहीं बजता। इसलिए दूसरी गाड़ियां जल्दी साइड नहीं देती। हेड लाइट भी अब ठीक से नहीं जलती। इसलिए रात को गाड़ी धीरे चलाना पड़ता है। पुरानी गाड़ियों में एसी भी नहीं है। गर्मी में पंखा काम नहीं करता। जब मरीज या घायल को बंद गाड़ी में अस्पताल लाते हैं तो उनकी गर्मी से और हालत खराब हो जाती है। जहर खाने व अन्य केस में मुंह पर हवा देने वाली सक्शन मशीन भी खराब हो चुकी है।

5 साल या ढाई लाख किमी तक चलाने का है नियम: नियम के अनुसार नई एंबुलेंस को पांच साल तक चलाया जा सकता है। ढाई लाख किमी एंबुलेंस चल सकती है, लेकिन हर महीने दो मेंटेनेंस की जरूरत होती है। उसके एक्यूपमेंट को भी बदला जाना है। विभाग मेंटेनेंस के नाम पर खानापूर्ति कर रहा है।

सीधी बात

ललित सिन्हा, डिस्ट्रिक्ट मैनेजर, दुर्ग बालोद जोन

पुरानी एंबुलेंस से दिक्कत तो है पर सरकार की ओर से देरी है, हम कर भी क्या सकते हैं

सात साल पुरानी एंबुलेंस चलाकर घायलों की जान आफत में डाली जा रही है?

हां यह दिक्कत तो हैं, शासन से गाड़ी बदलने मांग की गई है।

ढाई लाख किमी के बाद गाड़ी बदलना था, यहां 3.50 लाख किमी चल चुकी है?

- नई गाड़ी नहीं मिलने के कारण पुरानी को ही मरम्मत करवाकर काम चला रहे हैं।

तो क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा, अगर किसी दिन घायल की मौत हुई तो कौन जिम्मेदार होगा?

- शासन को दोबारा पत्र भेजकर जल्दी गाड़ी बदलने मांग की जाएगी। हमारे हाथ में अभी कुछ नहीं है। फिर भी मरीजों को बेहतर सुविधा देने की कोशिश कर रहे हैं।

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