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11वीं शताब्दी की प्रतिमाएं खुले में, सहेजने सरकार का ध्यान नहीं, संग्रहालय भी बंद

3 वर्ष पहले
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विश्व धरोहर दिवस पर भास्कर ने जिले के कुछ खास धरोहरों की वर्तमान स्थिति का जायजा लिया। तो सच्चाई सामने आई कि जिला बने सात साल हो गए लेकिन उन्हें सहेजने के लिए कुछ नहीं किया गया। दिखावे के लिए कई योजनाएं तो बनी पर काम नहीं हुआ। जिसके कारण धरोहरों का अस्तित्व संकट में हैं।

टीम जब दोपहर 12 बजे नगर के बूढ़ापारा तालाब के पास पहुंची तो यहां मौजूद राजवंश की निशानी किले के अवशेष गिरने की कगार पर दिखा। नगर पालिका या पुरातत्व विभाग ने उन्हें सहेजने के लिए कुछ नहीं किया। पर प्रकृति ने उसे बचा कर रखा है। बरगद पेड़ ने किले की दीवार को संभाल कर रखा है। सरकार की नाकामी को दिखाती तस्वीर यहां सामने आई। जहां 11 वीं शताब्दी की देवी देवताओं व सिपाहियों की करीब 100 मूर्तियां हैं। पर वह अपनी चमक व पहचान खो चुकी है। इन प्राचीन मूर्तियों सहेजने किसी का ध्यान नहीं है। विभाग सिर्फ कागजों में योजना बना रहा है। लेकिन धरातल पर कुछ नहीं हुअा है।

बालोद के बूढ़ापारा में संग्रहालय में रखी मूर्तियों की पहचान मिट गई है।

पाषाणकाल के करकाभाट कब्रगाह का भी वही हाल

जब भास्कर धमतरी मार्ग में करकाभाट के पाषण कालीन कब्रगाह पहुंचा तो वहां भी बदहाली नजर आई। 26 सौ साल पुराने पत्थर के पिरामिड को सहेजने के लिए अब तक कोई प्रयास नहीं हुआ। विभाग सिर्फ बोर्ड लगाकर भूल गई है। 10 साल से सिर्फ कार्ययोजना बन रही है। सुरक्षा के उपाय नहीं होने से यहां के कई पत्थर चोरी हो चुके है। सहेजने के लिए कब्रगाह के क्षेत्र में दीवार का निर्माण किया जाना है। जिला प्रशासन ने 15 लाख का प्रोजेक्ट भी बनाया था। पर कुछ नहीं हुआ। पुरातत्व समिति के सचिव आरके शर्मा ने कहा शासन को प्रोजेक्ट भेजा गया था। 15 लाख से दिवार निर्माण सहित अन्य मूलभूत सुविधा के काम होने होने हैं। ताकि यहां लोग घुमने के लिए आ सके। पर स्वीकृति नहीं मिली। महापाषाणीय संस्कृति के अवशेष चिरचारी, मुगजहन, करहीभदर, नवापारा, सोरर में भी है। करकाभाट के कब्रगाह(पिरामिड) के संबंध में मान्यता है कि लोग दिवंगत व्यक्ति की स्मृति व सम्मान में पाषाण स्तंभ या स्मारक खड़ा करते थे।

जगन्नाथपुर व कपिलेश्वर शिव मंदिर की भी उपेक्षा

15वीं शताब्दी का शिवमंदिर जगन्नाथपुर को पुरातत्व विभाग संरक्षण में लेकर भूल गया। अब मंदिर धराशायी होने की स्थिति में है। कपिलेश्वर शिवमंदिर समूह परिसर बालोद में बावली को संरक्षित करने कोई प्रयास नहीं हुआ। जिसका निर्माण 13वीं-14वीं सदी में नागवंशी राजाओं के शासनकाल में हुआ था। कुकुरदेउर मंदिर मालीघोरी स्मारक है, जो भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण फणि नागवंशी शासकों ने 14-15वीं सदी ईस्वी के मध्य हुआ है। सोरर चिरचारी में प्रस्तर स्तंभों पर आधारित मंडप या मठ अब जीर्णशीर्ण स्थिति में है। गोंडवाना समाज के पूर्व अध्यक्ष चेतन नागवंशी ने कहा पुरातत्व विभाग रायपुर जाकर नगर पालिका के जरिए मूर्तियों को सहेजने शेड व कांच का घेरा बनाने, संग्रहालय का नाम राजा लाल श्याम शाह करने की मांग की गई है। पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

ग्राम नर्राटोला में खुदाई के दौरान मिली थी मूर्तियां

जिला बनने के कुछ साल बाद पालिका ने इन मूर्तियों की पहचान के लिए छोटे-छोटे चबूतरे बनाकर मूर्ति की खासियत नाम लिखकर स्थापित किया था। पर सभी मूर्तियों की पहचान अब मिट चुकी है। अक्सर संग्रहालय बंद रहता है। लोग इन मूर्तियों का दर्शन भी नहीं कर पाते। 1992 में इसका निर्माण हुआ था। नर्राटोला में खुदाई के दौरान ये मूर्तियां मिली थी। आज की पीढ़ी को बालोद के इतिहास से परिचय कराने के लिए संग्रहालय व राज किला के अवशेष को सहेजना बहुत जरूरी है।

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