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शौचालय निर्माण जारी, डस्टबिन भी नहीं बंटी, कचरे की भरमार, रैंिकंग में मायूसी

3 वर्ष पहले
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स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 में सफाई के मामले में बालोद शहर सहित जिले के किसी भी नगरीय निकाय की रैंकिंग जारी नहीं हुई है, वजह ये कि इनमें कोई टाॅप 10 में नहीं है। अफसर कह रहे हैं कि इस माह वास्तविक रैकिंग के बारे में जानकारी मिल जाएगी। वैसे भी बालोद शहर पहली बार इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हुआ था। दिल्ली से बुधवार को केवल चुंनिदा शहरों के नाम घोषित किए गए हैं, जिसमें बालोद का नाम नहीं है। यह तो स्पष्ट है कि एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में सफाई के मामले में बालोद टॉप-10 में नहीं है। ओडीएफ घोषित होने के बाद भी शौचालय बन रहे हैं। डस्टबिन नहीं है। शहर में गंदगी फैली है। कचरा नष्ट करने में देरी हो रही है,इसलिए बालोद टॉप टेन में नहीं आ पाया। सफाई के नाम पर सालाना 30 लाख खर्च बावजूद एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में बालोद का नाम नहीं।

इसके अलावा अन्य निकाय भी। स्वच्छता सर्वेक्षण 2018 के तहत जिले के 8 नगरीय निकाय बालोद, दल्लीराजहरा, अर्जुन्दा, गुरुर, डौंडी, डौंडीलोहारा, चिखलाकसा, गुंडरदेही में फरवरी में केन्द्रीय टीम के सदस्यों ने सर्वे किया था। इसके अलावा पूरे देशभर के शहरों में सर्वे हुआ। जिसके आधार पर रैकिंग जारी की गई। जिले के अफसरों का कहना है कि हमारे पास रिपोर्ट नहीं आई है।

सार्वजनिक स्थानों पर दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के भरोसे हो रही सफाई

बालोद. तालाबाें की नियमित सफाई नहीं, कभी-कभी होती है सफाई।

स्वच्छता सर्वे रैंकिंग में क्यों पिछड़े हम, जानिए 7 कारण

1. कचरा प्रबंधन में देरी: फरवरी में जब सर्वे के लिए दिल्ली की टीम का यहां दौरा हुआ था, तब शहर में जैविक खाद बनाने का काम शुरू नहीं हो सका था। इस दौरान खुले में ही कचरा डंप हो रहा था। स्वच्छ सर्वेक्षण में यह महत्वपूर्ण बिंदु है। माना जा रहा है कि कचरा प्रबंधन में नाकामी बड़ी वजह हो सकती है।

2. सफाई की पुरानी व्यवस्था: सफाई के लिए पुरानी व्यवस्था ही शहर में लागू रही। जब सर्वे टीम पहुंची तो नालियों में गंदगी दिखी। स्वसहायता समूह की महिलाएं घर में जाकर डोर टू डोर कचरा कलेक्शन तो कर रही थी लेकिन सार्वजनिक जगहों में कचरे का ढेर था।

3. शौचालय बनाने का काम चलता रहा: भले ही बालोद को ओडीएफ घोषित किया जा चुका था लेकिन सर्वे के दौरान भी शौचालय बनाने का काम चल रहा था। टीम के सदस्यों ने खुद शौचालय के संबंध में हितग्राहियों से चर्चा की थी।

4. शौचालय में सफाई नहीं, तालाब भी गंदा: शहर के सार्वजनिक स्थानों में शौचालय तो बने है लेकिन सफाई में एजेंसी व नपा ध्यान नहीं दे रही है। वहीं तालाबों की सफाई भी नियमित नहीं हो पा रही है।

5. पहली बार प्रतिस्पर्धा में शामिल, कोई आइडिया नहीं: स्वच्छता सर्वेक्षण में बालोद पहली बार शामिल हुआ था। पिछली बार सिर्फ नगर निगम के लिए प्रतिस्पर्धा हुई थी। अफसर खुद स्वीकार कर रहे हैं कि पहले से इस संबंध में जानकारी रहती तो बेहतर काम होता फिर भी हम संतुष्ट है।

6. दुकानों में नहीं बंटी डस्टबिन: घरों से सूखा और गीला कचरा अलग-अलग जमा करने के लिए 20 वार्डों में डस्टबिन बांटी जानी थी। लेकिन जिस वक्त सर्वे किया गया, पता चला कि डस्टबिन शहर में सिर्फ घरों तक ही पहुंच पाई है, दुकानों में नहीं। वहीं चार्ज देने के डर से कई लोग इसका उपयोग ही नहीं कर रहे थे।

7. लक्ष्य से ज्यादा मोबाइल एप डाउनलोड लेकिन कार्रवाई कम: केन्द्रीय टीम ने यहां जिन बिंदुओं पर सर्वे किया था, उनमें सफाई के लिए मोबाइल एप का उपयोग शामिल है। नपा ने लक्ष्य 300 से ज्यादा 500 लोगों को मोबाइल पर एप डाउनलोड करवाया लेकिन शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई में देरी होती रही। मापदंडों के अनुसार एप में जैसे ही शिकायत अपलोड किया जाए, तुरंत निराकरण होना चाहिए।

एप में शिकायत के बाद तत्काल कचरा उठाने नहीं आते, देर से आते हैं।

अभी तो ट्रायल है, अगली बार टाॅप-10 में अाएंगे

नपा अध्यक्ष विकास चोपड़ा का कहना है सफाई को लेकर हमने अपने स्तर पर बेहतर प्रदर्शन किया। अभी तो ट्रायल है, क्योंकि पहली बार इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हुए। अभी तो हर साल इस तरह रैकिंग जारी किए जाएंगे। इस बार नहीं अगली बार टाॅप-10 में आएंगे।

देश में नहीं लेकिन प्रदेश में टाॅप 20 में आएंगे

सीएमओ रोहित साहू व स्वच्छता निरीक्षक पूर्णानंद आर्य का कहना है कि देश में तो नहीं लेकिन प्रदेश में टाॅप-20 में आएंगे। वास्तविक रैकिंग जारी तो नहीं हुई है लेकिन कई शहरों से बालोद की स्थिति बेहतर है। लोगों में जागरूकता हो तो परिणाम और अच्छा रहेगा। लोगों की सहभागिता बिना कोई भी शहर बेहतर प्रदर्शन कर ही नहीं सकता।

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