भास्कर संवाददाता | बालोतरा (आंचलिक)
कनाना में आयोजित श्रीमद भागवत कथा में सोमवार को मठाधीश परशुराम गिरी महाराज ने कहा कि भक्त व भगवान का अटूट नाता है। जो मनुष्य भगवान के प्रति समर्पण भाव रखता है उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। उन्होंने का कहा कि नर सेवा ही नारायण सेवा है। व्यक्ति को नशा त्यागकर समाजहित में कार्य करना चाहिए। भक्त जयगोपाल दवे ने बताया कि हर रोज बड़ी संख्या में कथा सुनने के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे है। मंगल परिवार की ओर से कथा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर पं.लक्ष्मण दत्त, बृजमोहन शर्मा, जेपी दवे, कैलाश दवे, टीएस दवे, तेजप्रकाश वैष्णव, दाऊलाल दवे, बाबूलाल दवे, हेमंत व्यास, पृथ्वीराज दवे, मनोज शर्मा मौजूद थे।
श्रीमद् भागवत कथा का समापन : लीलसर. स्थानीय मुथा मैदान में चल रही श्रीमद् भागवत कथा का समापन पर सोमवार को शोभायात्रा निकाली गई। कथा के समापन पर कृष्ण-सुदामा का प्रसंग सुनाया गया। कथा वाचक दयाराम महाराज द्वारा सुदामा की दीन दशा का मार्मिक वर्णन किया गया तो पंडाल में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं की आंखों से आंसू निकल गए। कथा वाचक ने कहा कि जब राजा दशरथ ने पुत्रेष्ठि यज्ञ द्वारा अग्नि देव से खीर का प्रसाद प्राप्त किया तथा उसे अपनी दो रानियों कौशल्या व कैकेयी को वितरित किया था, इतने में कौवे के वेश में आए देवता कागभुसुंडि पात्र को लेकर उड़ गए तथा उसे मां अजनी के मुख में डाल दिया। इस घटना के बाद कौशल्या व कैकेयी ने अपने-अपने हिस्से के प्रसाद से दो भाग सुमित्रा को दे दिया। इस प्रकार चारों भाईयों के साथ ही शिव के ग्यारहवें रूद्र हनुमान का जन्म भी हुआ। इसके बाद महाराज दीक्षित ने भगवान सुकदेव महाराज द्वारा राजा परीक्षित को भागवत के अंतिम अध्याय सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाया। कहा कि शिक्षा ग्रहण के समय सुदामा द्वारा छोटी सी की गई चोरी ने उन्हें पूरे जीवन में दरिद्रता का अभिशाप दे दिया। कई दिनों से भूख से तड़प रहे बच्चों की दशा जब सुदामा की पत्नी से देखी न गई तो उन्होंने सुदामा को अपने बाल सखा श्रीकृष्ण के दरबार में जाने का अनुरोध किया। जिस पर एक पोटली में टूटे चावल रखकर सुदामा द्वारिका नगरी में पहुंचे। कई बार अनुनय-विनय के बाद जब द्वारपालों ने उन्हें महल में प्रवेश नहीं करने दिया और यह बात द्वारिकाधीश को पता चली तो नंगे पांव ही दौड़े-दौड़े द्वार पर पहुंच गए। सुदामा को अपने आसन पर बिठाकर परात में पानी से नहीं बल्कि अपने आंसुओं से उनके पांव धुले तथा पोटरी में बंधे टूटे चावलों को खाकर भगवान ने सुदामा को दो लोकों का स्वामी बना दिया। यह मार्मिक प्रसंग झांकी के माध्यम से जब कथा वाचक ने सुनाया तो पूरे पंडाल में मौजूद लोगों की आंखें भर आईं। इस दौरान जसवंताराम बेनीवाल, नरेश मुथा, रतनलाल मुथा, मदन सोनी, रुपाराम प्रजापत, पेमाराम बेनीवाल आदि मौजूद रहे।
बालोतरा. कथा के दौरान मौजूद श्रद्धंालु।
लीलसर . कथा के दाैरान सजी झांकी।