जिले के बड़ोदिया में ऐसा परिवार जहां माता पिता से लेकर बेटा, 5 बेटियां-दामाद और 5 भानजा-भानजी सभी शिक्षक हैं। इसी विशेषता के कारण ठाकुर परिवार की अलग पहचान है। भ्रूण हत्या के पाप का कलंक ढो रही इस शताब्दी में जहां आधुनिक तथाकथित सोच रखने वाले दंपती कोख में ही भविष्य की मां और बहन को मौत के घाट उतारने में तनिक भी नहीं हिचकिचाते। ऐसे में शिवशंकर ठाकुर और बसंती ठाकुर की बेटियों को पढ़ाने व कामयाब बनाने की सोच अपने आप में मिसाल है। परिवार से वरिष्ठ अध्यापक रहे शिवशंकर ठाकुर, प|ी बसंती ठाकुर, पुत्र वैभव ठाकुर समेत छह में से पांच बेटियां और चार दामाद शिक्षक हैं। खास बात यह है कि इस परिवार का बेटा वैभव ठाकुर संस्कृत प्राध्यापक परीक्षा में राजस्थान में टॉपर रहा हैं। इस परिवार के ज्यादातर शिक्षक-शिक्षिकाएं इसी जिले के स्कूलों में पढ़ाते हैं। हाल ही घर में नवागत बहू वैशाली ठाकुर भी 12वीं की बोर्ड परीक्षा में राजस्थान मेरिट में आ चुकी है। वहीं फिलहाल एमए बीएड करने के बाद सेकंड ग्रेड की परीक्षा देकर शिक्षिका बनने की कतार में है। परिवार के मुखिया शिवशंकर ठाकुर और उनकी प|ी बसंती ठाकुर एक साल पहले ही रिटायर हो चुके हैं। इनके बेटे वैभव ठाकुर बड़ोदिया स्कूल में संस्कृत प्राध्यापक हैं। वहीं छह बेटियां है, जिनकी शादी हो चुकी हैं। साथ ही बड़े जीजाजी वरिष्ठ शिक्षक पद और दो जीजाजी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं। एक बेटी भावना जोशी भी बीए पास है।
बेटा संस्कृत प्राध्यापक परीक्षा में रहा राजस्थान टॉपर, बहू भी 12वीं बोर्ड की मेरिट होल्डर, अब शिक्षिका बनने की तैयारी
मुखिया शिवशंकर और पूरा परिवार।
परिवार में ये हैं शिक्षक-शिक्षिकाएं
मुखिया शिवशंकर के पुत्र वैभव ठाकुर प्राध्यापक संस्कृत, 6 में से पांच बेटियां शोभना ठाकुर, सुलोचना ठाकुर, चित्रा उपाध्याय, अनामिका शुक्ला, दीप्ति ठाकुर, दामाद राजेशप्रसाद ठाकुर (प्रधानाचार्य), हितेष जोशी, नीरज उपाध्याय (प्राध्यापक) और नीलेश ठाकुर, भानजी शर्मिष्ठा जोशी, भानजा हेमंत जोशी, डॉ. राजेश जोशी (कॉलेज व्याख्याता) हितेष पुरोहित, पवन जोशी, हरेंद्र जोशी (प्रधानाचार्य) एमए संस्कृत में गोल्ड मेडलिस्ट भी शिक्षक हैं।
शिक्षा और संस्कार को दी सर्वोच्च प्राथमिकता
बड़ोदिया की शैक्षिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अपने आप में विलक्षण और जिले की राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली रही है। शिवशंकर ठाकुर की शैक्षिक यात्रा काफी महत्वपूर्ण रही। उन्होंने परिवार के प्रत्येक सदस्य को शिक्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। संघर्षों को जीवन का हमसफर बनाकर शिवशंकर ठाकुर ने शिक्षा और संस्कार को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनकी छह बेटियों ने भी इस सूत्र को चरितार्थ किया है कि बेटियां दो कुल को तारती हैं और वंश को उबारती हैं। उन पर की गई मेहनत समाज, राष्ट्र और विश्व को गौरव देती हैं।