बांसवाड़ा| पुरुषोत्तम माह के उपलक्ष्य में कुशलबाग मैदान में आयोजित श्री मारुति महायज्ञ और भागवत कथा के चौथे दिन गो संत और राष्ट्रसंत का मिलन हुआ।
द्वारिकाधीश गोशाला के संत रघुवीरदास महाराज ने कथावाचक राष्ट्रसंत डॉ. तरुण मुरारी बापू की कथा सुनी। कथावाचक ने कहा कि मनुष्य अंदर के गुणों को नहीं देखता वह बाह्य चमड़ी को देखकर प्रभावित हो रहा है। राष्ट्र की अखंडता के लिए प्रेरित करते हुए कहा कि भारत पहले अखंड भारत था। लेकिन हमारी ही कमजोरी के कारण वह धीरे धीरे टूटता चला गया। अब समय आ गया है हमारी वृत्ति बदलने का। कोई अगर एक गाल पर थप्पड़ मारे तो दूसरा गाल आगे करने की वृत्ति बदलनी होगी। इसकी वर्तमान में बहुत जरूरत है। शास्त्र के साथ शस्त्र संधान पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। सतीत्व की चर्चा करते हुए कहा कि भारत की नारी किसी को गुरु बनाए। यदि कोई नारी गुरुत्तर दायित्व निभाते हुए धर्म धारित हो तो उसे गुरु बनाएं।
सुलोचना का प्रसंग सुनाया
कथावाचक ने सतीत्व के विषय पर सुलोचना का प्रसंग सुनाया। उन्होंने कहा कि मेघनाद जब रण युद्ध में गया तो वहां लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया। उसने सुलोचना को विश्वास जगाया कि युद्ध में राम को पराजित कर देंगे। इसके बाद रावण भी अति उत्साहित हो गया। सुलोचना के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा कि मेघनाद ने दृश्य बदल दिया। अपनी विजय निश्चित है। इसके बाद सुलोचना बोली कि सही में दृश्य बदल गया था, पर अब विजय हार में बदल जाएगी। कारण यह है कि आज तक मेरे तन को किसी पर पुरुष ने हाथ नहीं लगाया। लेकिन आप भले ही मेरे ससुर हो पर यह अनुचित हो गया है। मेरा सतीत्व भंग हो गया है। अब हार निश्चित है। कथा के दौरान संगीत और भजनों की भी प्रस्तुतियां दी गई। रघुवीरदास महाराज ने कहा कि व्यासपीठ से उद्धृत कथन को सही अर्थ में समझना चाहिए और उसके अनुसार जीवन का निर्वहन करना चाहिए। संचालन भुवन मुकुंद पंड्या ने किया।
व्यास पीठ का पूजन
दीपक गृहस्थी और घनश्याम सेन ने बताया कि कथा से पहले मुख्य यजमान परिवार पुष्पेंद्रसिंह तंवर, कमलेश गहलोत, देवेंद्रसिंह, मनोज सोलंकी, शिवप्रसाद माहेश्वरी, संजय सेन, गिरीश भट्ट, नरसिंह,बहादुर महाराज, केसर गिरी महाराज, लक्ष्मण डामोर, कलजी महाराज आदि ने व्यासपीठ का पूजन और अभिवादन किया। इस दौरान पंजाबी समाजजन, अंबामाता महिला मंडल, अनिल टांक, विजय गुर्जर, धर्मेंद्र शर्मा, सुरेश गुप्ता मौजूद थे।
धर्म-समाज
भागवत कथा करते डॉ. तरुण मुरारी बापू और मौजूद गोसंत रघुवीरदास।