विज्ञान से ही मिट सकता है अज्ञान: साध्वी
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की ओर से रामपुरा फूल में सत्संग समागम का आयोजन किया गया। इसमें साध्वी हरजोत भारती ने कहा कि वेदांत मनुष्य में परिपूर्णता लाने के लिए दिशानिर्देश देता है। वह कहता है कि अपने जीवन का विश्लेषण करो। खोजो कि जीवन का सार क्या है। वह यह भी स्पष्ट करता है कि संसार में आपके जीवन का अर्थ क्या है, आशय क्या है, वह आपको स्वयं के बारे में सोचने के लिए प्रशिक्षण देता है। वह कहता है अंधविश्वासों और यांत्रिक अनुष्ठानों के प्रति अपने काे समर्पित मत करो। खोज करो आत्मा की। आत्म साक्षात्कार ही जीवन का लक्ष्य है। वह आपके अज्ञान और भ्रम को दूर करके आपको परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताता है। नि:संदेह अज्ञान को विज्ञान के जरिए ही मिटाया जा सकता है। ईश्वर के रहस्य को प्रकट करने के लिए तृतीय नेत्र का प्रकट होना आवश्यक है तथा इस नेत्र की प्राप्ति के लिए किसी समर्थ गुरु की शरण में ही जाना होगा। वेदांत हमें यही शिक्षा देता है। परंतु इसकी दीक्षा के लिए तो हमें स्वयं कदम बढ़ाकर इस प्रक्रिया से गुजरना होगा।
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से आयोजित कथा में प्रवचन करतीं साध्वी हरजोत भारती और प्रवचन सुनते श्रद्धालु।
कलियुग में ईश्वर को पाने के लिए केवल भगवान नाम ही आधार: कथा वाचक
बठिंडा| बल्ला राम नगर में स्थित संत शिरोमणि श्री बाला जी मंदिर चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर भगवान श्री परशुराम जयंती एवं श्री हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन बुधवार को कथा वाचक श्रद्धेय ध्रुव कृष्ण ने भागवत व धर्म से संबंधित प्रवचन किया। उन्होंने बताया कि नि:स्वार्थ प्रेम से ईश्वर ही नहीं संसार को भी जीता जा सकता है। प्रेम से मानव जीवन धन्य हो जाता है। आज विकृति फैल गई है। विकृति को दूर करना ही मानवता है। ईश्वर को पाने के लिए कलियुग में केवल भगवान नाम को ही आधार माना गया है। उन्होंने बताया कि सतयुग में मानव जीवन एक लाख वर्ष, त्रेता में 10 हजार वर्ष, द्वापर में 1000 वर्ष होता था। जबकि कलियुग में मात्र 100 वर्ष है। सभी युगों में तपस्या अनुष्ठान कई तरह के धार्मिक कार्य किए जाते थे, लेकिन कलियुग में नाम से ही मनुष्य तर जाता है।
भक्ति के बताए नौ रूप
उन्होंने भक्ति के नौ रूप बताते हुए कहा कि सत्संग सुनना और करना पहली और दूसरी भक्ति हैं। गुरु पूजा को भक्ति का तीसरा रूप बताया गया है। वहीं मानव का जीवन में अभिमान रहित होना भक्ति का चौथा रूप है। जीवन में मंत्र जाप करते हुए कपट का त्याग करना पांचवां रूप है वहीं निष्काम भाव से किये गए सत्कर्म भक्ति का छठा रूप है। सदैव मन में भगवत भाव रखना भक्ति का 7वां रूप है वहीं कर्म वश जीवन में लाभ व हानि से संतुष्ट रहना 8वां रूप है। जीवन को प्रभु चरणों में समर्पित कर देना ही भक्ति का नवम रूप है।