साहित्य, कला व जनचेतना के मंच ने सुरेश हंस के दूसरे उपन्यास मौन का रविवार को विमोचन और परिचर्चा की। विशेष तौर पर पहुंचे रायपुर छत्तीसगढ के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. तजिंदर गगन, चंडीगढ़ के वरिष्ठ लेखक कवि और अनुवादक प्रो. फूलचंद मानव, प्रो. योगेश्वर कौर, दिल्ली के वरिष्ठ साहित्यकार व फिल्म निर्माता डॉ. गौरी शंकर रैना, सिरसा के लेखक कवि डॉ. हरभगवान चावला, कवि गुरबक्श मोंगा, लघु कथाकार व कवि जितेंदर भाटिया ने पुस्तक का विमोचन किया। शमां रोशन से शुरू समागम में होनहार गायिका पूर्वशी ने प्रस्तुति दी। चंडीगढ़ के अलंकार थिएटर में चक्रेश जी के निर्देशन हुई मौन की नाटकीय प्रस्तुति का डिजिटल प्रस्तुतिकरण हुआ।
हरभगवान चावला ने कहा कि लेखक ने सिद्धू के माध्यम से जीवन के बहुत से मौलिक प्रश्न उठाए। उनके अनुसार प्रेम, प्रकृति, समर्पण, दर्शन से इतर की ज्वलंत समस्याएं भी उपन्यास का हिस्सा बनी। प्रख्यात साहित्यकार डॉ. गंगा प्रसाद विमल की ओर से उपन्यास मौन पर रखे गए विचारों की वीडियो रिकार्डिंग पेश की। साहित्यकार व फिल्म निर्माता डॉ. गौरी शंकर रैना ने कहा कि उपन्यास के जरिए इंसान की छटपटाहट, प्रश्न ढूंढने की कोशिश, बेबसी का रहस्य और जीवन से हारी हुई व्यथा को उजागर करता है। वहीं यह अहसास दिलाया गया है कि समाज बदल रहा है, सब कुछ होता देखकर आंखें मूंद नहीं सकते और यह उपन्यास अंधी गली की तरफ ले जाता है जहां रोशनी की किरण दिखाई देती है। प्रो फूल चंद मानव ने बताया कि सुरेश हंस का यह दूसरा उपन्यास है, उनके प्रथम उपन्यास तिनका तिनका पर इन्हें केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय की तरफ से राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। तजिंदर गगन ने कहा कि उनका जीवन सरगुजा आदिवासियों के बीच रहा है जहां उन्होंने आदिवासियों के जीवन को बहुत नजदीक से देखा और पाया की उनके कबीले के लोगों और रुखसाना के किरदार में काफी समानता है। यह उपन्यास आने वाले देश के चर्चित उपन्यासों मे गिना जाएगा। गोष्ठी का संचालन मीनाक्षी चौधरी व नीरज शर्मा ने किया।
सुरेश हंस की कृति मौन की चर्चा-परिचर्चा में संबोधित करते साहित्यकार।