दबने के बावजूद बोलती रही जसोदा
मैं और तारू भाई नहर के लिए खुदाई का काम कर रहे थे। थोड़ी दूरी पर गांव के अन्य लोग भी काम कर रहे थे। शाम को काम खत्म करने में कुछ ही समय बचा था। तभी थोड़ी दूरी पर काम कर रहे दूसरे लोग सिर पर रखी तगारियां पटक कर भागने लगे। वो चिल्लाए की भागो-भागो, “शिला” (चट्टान) गिरने वाली है। तारू भाई दौड़ने लगा और मैं भी तगारी नीचे पटक कर भागने लगी तभी देखा की शिला ऊपर से फिसलते हुए हमारी और आ रही है।
कुछ सूझा नहीं इस कारण दौड़ कर नहर की दूसरी और दीवार के सहारे भागी और नीचे बैठ गई। लगा शिला सीधे सिर पर गिरेगी इस लिए बचने के लिए सिर के आगे हाथ कर दिया। अगले कुछ सेकंड समझ नहीं आया कि क्या हो रहा हैं पूरा अंधेरा हो गया। लगा शायद मैं नहीं बची। पहले तो कुछ अहसास नहीं हुआ तभी हाथ पर तेज दर्द महसूस हुआ। चट्टान दूसरी ओर की दीवार के सहारे टिक गई जिससे वहां छोटी से गुफा जैसी बन गई। हालांकि पूरा अंधेरा था और में अपनी गर्दन तक सीधी नहीं कर पा रही थी। पता नहीं कितना टाइम ऐसे ही बैठी रही। कुछ देर बाद लोगों की आवाजें आने लगी तो में चिल्लाई “मैं यहां हूं बचाओ कोई”। विश्वास नहीं हो रहा था कि मैं जिंदा हूं लेकिन तभी मेरे भतीजे की अावाज अाई। तब महसूस हुआ कि मैं बच गई लेकिन डर था कि कहीं ये पत्थर गिर गया तो नहीं बचूंगी। कुछ ही देर में वहां आस पास के लोग और पुलिस भी आ गई।
मैंने बोलना बंद कर दिया तो मुझे मरा समझ कर कहीं बचाव कार्य ना कर दे बंद
एक एक मिनट एक घंटे की तरह
भास्कर से बात करते हुए सूरजपुरा निवासी जसोदा उर्फ यशोदा ने बताया कि उस गुफा में फंसने के बाद वो बार बार चिल्ला रही थी कि बचाओ उसके परिजनों के साथ दूसरे लोगों की आवाज उसे सुनाई दे रही थी। अंदर कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन आवाजें आ रही थी। एक एक मिनट एक एक घंटे की तरह लग रहा था। दो तीन बार लगा कि बेहोश हो जाऊंगी। लेकिन ये डर था कि कहीं मैने बोलना बंद कर दिया तो मुझे भी मरा हुआ समझ कर कहीं काम बंद ना कर दे। खुद को बेहोश नहीं हाेने दिया। शाम करीब 4 बजे से कुछ पहले चट्टान मेरे ऊपर गिरी और करीब तीन घंटे बाद शाम 7 बजे से पहले गुफा में थोड़ी रोशनी आने लगी। सबसे पहले एक लड़का मेरे पास तक आया और फिर दो तीन जने और आए फिर मुझे जैसे तैसे बाहर निकाला। बाहर आने के बाद विश्वास हुआ कि मैं जिंदा हूं।
तो तारू भाई भी बच जाता
जसोदा ने बताया कि जिस जगह चट्टान सरकी वहां वह और तारू भाई ही काम कर रहे थे। थोड़ी दूरी पर दूसरे ग्रामीण काम कर रहे थे। चट्टान गिरने से पहले आस पास की मिट्टी सरकने लगी। जिस कारण डर कर दूसरे मजदूर भागने लगे और हमें भी बाहर निकलने के लिए चिल्लाने लगे। जिस पर तारू भाई और मैं दोनों भागने लगे लेकिन तभी मैंने देखा की चट्टान गिरने लगी। मैं दौड़कर दीवार से सट कर बैठ गई लेकिन तारू भाई भागने लगा। चट्टान तारू भाई पर गिर गई। अगर वो भी दीवार के सहारे खड़े होते तो शायद तारू भाई भी बच जाते।