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मंगल पांडे से पहले मगरे के लाल ने की अंग्रेजों से बगावत, आज मिली थी फांसी

3 वर्ष पहले
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की पहली क्रांति 1857 से पहले महानायक मंगल पांडे माने जाते हैं मगर उनसे भी पहले मगरे के लाल राजू रावत ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया था। मंगल पांडे ने जहां कारतूसों में चर्बी से सैनिकों का धर्मभ्रष्ट किए जाने की कोशिश पर गोली चलाई थी वहीं राजू रावत ने अंग्रेजों के नए कर व कानूनों और धर्म परिवर्तन की साजिशों के विरोध में बगावत की थी। पकड़े जाने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें 18 अप्रैल 1843 को ब्यावर में खुले में फांसी दे दी। बरार में स्थित उनके स्मारक पर रावत सेना की ओर से बुधवार को कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा।

वर्ष 1821 में कर्नल जेम्स टॉड बटालियन के साथ टॉडगढ़ पहुंचे। यहां के लोगों की कद-काठी देखकर उन्होंने मेरवाड़ा बटालियन का गठन किया। राजू रावत जो बरार (राजसमंद) में रहते थे उन्होंने अंग्रेज मिशनरी की ओर से चलाए जा रहे धर्म परिवर्तन, अत्याचार और अनावश्यक लगाए गए कर से परेशान होकर उनके खिलाफ विरोध का बिगुल बजा दिया। राजू रावत की इन विरोधी गतिविधियों से परेशान होकर अंग्रेजों ने उसे पकड़ने का निर्णय लिया लेकिन वह हर बार उन्हें चकमा देकर मगरे की पहाडिय़ों में ओझल हो जाता।मगर अंग्रेजों ने उनके भाई को पकड़ लिया और उनका सिर काटकर खूंटा की बड़ी में स्थित एक बड़ के पेड़ पर यह सोचकर टांग दिया कि राजू रावत जब अपने भाई के शव को लेने आएंगे तो उन्हें अंग्रेज पकड़ लेंगे। इधर मां पेमादेवी की प्रतिज्ञा, कि बेटे के अंत्येष्टि विधि-विधान से हो को देखते हुए राजू रावत ने दिलेरी दिखाते हुए अंग्रेजों से अपने भाई के शव को कब्जे में उनका अंतिम संस्कार किया। इसके बाद वह अंग्रेजों की और ज्यादा खिलाफत करने लगे और 12 साल तक वह अंग्रेजों को छकाते रहे। इधर अंग्रेजों ने उसे पकड़ने के लिए घेरा और तंग कर दिया। बराखन में उनकी शादी हुई थी। मगर बाद में ससुर को मजबूर कर अंग्रेजों ने राजू रावत को पकड़ लिया। जिसे बैलगाड़ी पर लिटाकर उसके हाथ-पैर में कीलें ठोक कर उसे जनता के बीच घुमाया, जिससे अंग्रेजी हुकूमत का कोई ओर विरोध न कर सके। बाद में इस मामले की सुनवाई करते हुए ब्यावर में कर्नल डिक्सन ने राजू रावत को 18 अप्रैल 1843 में खुली फांसी देने की सजा सुनाई।

ब्यावर. बरार स्थित शहीद राजू रावत स्मारक।

बेटे की शहादत पर मां को लड्डू खिलाया

अंग्रेजों ने बेटे की शहीदी पर मां को लड्डू खाने को विवश किया, इस पर भी मां ने बेटे की शहीदी पर गर्व करते हुए अंग्रेजों के हाथ से लड्डू लेकर खाया। इसके बाद फौज में अधिकारियों के बाद जब जवानों के धर्म परिवर्तन की बात सामने आई तो जनता में भारी विरोध हुआ। यहां के लोग मानते हैं कि मंगल पांडे से पहले ही राजू रावत ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बजाया था।

ब्यावर में भी हो आयोजन : राजकीय पटेल उच्च माध्यमिक विद्यालय के पूर्व प्राचार्य और राजस्थान रावत राजपूत महासभा के मुख्य चुनाव आयुक्त नारायण सिंह पंवार ने बताया कि शहीद राजू रावत के शहीदी दिवस पर ब्यावर में भी कार्यक्रम आयोजित होना चाहिए। इसकी वजह है शहीद राजू रावत को ब्यावर में ही फांसी दिया जाना। जिन्हें वर्तमान में ब्यावर क्लब के समीप ही फांसी दी गई थी।

शहीद राजू रावत के बरार स्थित स्मारक पर प्रतिवर्ष सेना की ओर से कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इस बार भी सेना की ओर से उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किए जाएंगे। महेंद्र सिंह रावत, संस्थापक रावत से

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