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ब्यावर में ही मिलेगा टीबी के मरीजों को बेहतर उपचार

3 वर्ष पहले
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मिनरल, माइनिंग और पत्थरों की घिसाई से जुडे श्रमिकों को अब अत्याधुनिक जांच और बेहतर उपचार के लिए अब अजमेर या जयपुर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। इसके लिए ब्यावर के डिस्ट्रिक्ट ट्यूबर क्लोसिस सेंटर पर पूरा आधुनिक अस्पताल बनेगा। इसके लिए डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट की ओर से डीटीसी को 1 करोड 80 लाख का बजट मिला है। जिससे जिला क्षय रोग निवारण केंद्र की दशा तो सुधरेगी ही बल्कि टीबी के मरीजों के साथ ही सिलिकोसिस के मरीजों को भी आधुनिक उपचार की सुविधा मिल सकेगी। डीएमएफटी से स्टेट ट्यूबर क्लोसिस विभाग को बजट जारी किया गया है। हालांकि जरूरत को देखते हुए ब्यावर डीटीसी के लिए 50 लाख रुपए की ओर मांग की गई है। वहीं चिकित्सा विभाग द्वारा लुलवा सीएससी को 5 करोड़ का बजट उसके नवीनकरण के लिए जारी किए गए है। हालांकि इसको लेकर भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि जिला क्षय निवारण केंद्र की जर्जर हालात और मरीजों की संख्या को देखते हुए डीटीसी के लिए 5 करोड़ के बजट की जरूरत थी।

वार्ड कमरे के साथ बनेगी अत्याधुनिक लैब

जिला क्षय रोग निवारण केंद्र को जार किए गए 1 करोड़ 80 लाख के बजट से पूरे टीबी अस्पताल की सूरत ही बदल जाएगी। भविष्य की योजनाओं को ध्यान रखते हुए 1 करोड़ 80 लाख के बजट से टीबी अस्तपाल की जमीन पर मरीजों के लिए 10 से 20 पलंग वाला वार्ड और 23 कमरों के साथ ही अत्याधुनिक लैब का भी निर्माण किया जाएगा। चिकित्सा विभाग के अनुसार इसके लिए अलग से स्टॉफ की भी भर्ती की जाएगी।

आधुनिक होगी लैब : डिस्ट्रिक ट्यूबर क्लोसिस सेंटर ने ब्यावर द्वारा लैब के लिए 50 लाख का बजट और मांगा गया है। जानकारी के अनुसार टीबी सेंटर पर या तो पुराने माइक्रोस्कोप है या नए उपकरणों का इंस्टॉलेशन ही नहीं हो सका है। यही कारण है कि कई बार मरीजों के बलगम की जांच सही से नहीं हो पाती। बनने वाली अत्याधुनिक लैब के आधुनिक उपकरणों के लिए डीटीसी द्वारा 50 लाख के अतिरिक्त बजट की मांग उठाई गई है।

ट्रस्ट के खाते में जमा हुए 220 करोड़

डीएमएफटी के अनुसार माइनिंग विभाग द्वारा वसूली गई रॉयल्टी से ट्रस्ट के खाते में 220 करोड़ रुपए जमा हुए है। इस राशि से ना सिर्फ सिलिकोसिस पीडितों और मृतकों को मुआवजा दिया जाएगा बल्कि माइनिंग और मिनरल क्षेत्र के विकास के लिए भी कार्य किया जाएगा।

फंड से होंगे विकास के काम भी : जानकारी के अनुसार ट्रस्ट के फंड में जमा होने वाली राशि से प्रभावित क्षेत्रों में साफ पीने के पानी की व्यवस्था, प्रदूषण कम करने पर काम करना, स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि करना, हेल्थ इंश्योरेंस, शिक्षा, बीमारी से ग्रसित श्रमिकों के बच्चों के लिए स्पेशल प्रोग्राम चलाने, दिव्यांग श्रमिकों के हित, स्किल डवलपमेंट, सेनिटेशन जैसे कार्य भी किए जाएंगे।

पुरानी गायनिक विंग में होगा शिफ्ट : जिला क्षय रोग निवारण केंद्र का कायाकल्प 1 करोड़ 80 लाख रुपए के बजट से होना है। गत दिनों जिला कलेक्टर की मौजूदगी में हुई डीएमएफटी की मीटिंग में ये मुद्दा उठा कि अस्पताल के कायाकल्प के दौरान मरीजों को परेशानी हो सकती है। ऐसे में ये सुझाव दिया गया कि जब तक डिस्ट्रिक ट्यूबर क्लोसिस सेंटर के नवीनीकरण का कार्य हो तब तक जिला क्षय रोग निवारण केंद्र एकेएच की पुरानी गायनिक विंग लेबर रूम और वार्ड में शिफ्ट कर दिया जाए।

मुआवजे के लिए ट्रस्ट का गठन

सिलिकोसिस पीड़ितों की समस्या को देखते हुए सरकार द्वारा कुछ अर्से पूर्व एक अध्यादेश लागू किया गया। अध्यादेश के अनुसार सिलिकोसिस पीड़ितों को मुआवजा राशि बंटवाने के लिए एक ट्रस्ट का गठन किया गया। जिसका नाम डीएमएफटी (डिस्ट्रिक मिनरल फाउंडेशन ट्रस्ट) रखा गया। ट्रस्ट के चेयरमेन पदेन जिला प्रमुख होते हैं और वाइस चेयरमेन जिला कलेक्टर को बनाया गया। खान इंजीनियर, वन विभाग का एक प्रतिनिधि, राजस्व अधिकारी, पीडब्ल्यूडी इंजीनियर, मेडिकल ऑफिसर, राजस्थान स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड का प्रतिनिधि, डिस्ट्रिक सोशल वेलफेयर ऑफिसर ट्रस्ट की कार्यकारिणी में होंगे। इसके साथ ही माइंस ऑनर एसोसिएशन के प्रेसिडेंट जो पांच साल से उक्त जिले में कार्यरत हो को सरकार नियुक्त करेगी, प्रभावित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाला एक व्यक्ति, माइंस में कार्य करने वाले श्रमिकों में दो चयनित श्रमिक, उक्त क्षेत्र में कार्य करने वाली एनजीओ का सदस्य, जिले में कार्यरत टैक्निकल माइनिंग मेंबर और कोई अन्य अधिकारी या व्यक्ति मनोनीत सदस्य हैं।

इसलिए बना ट्रस्ट : दरअसल सिलिकोसिस को लेकर श्रमिकों की मौतों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही थी। मनीष ने बताया कि माइनिंग वाले इलाकों में कार्य करने वाले श्रमिकों को सिलिकोसिस होने के बाद सबसे बड़ी समस्या खुद की बीमारी साबित करने की होती है तथा उसके बाद मुआवजे की आस में कई श्रमिक जान से हाथ धो बैठते हैं। ऐसे श्रमिकों की समस्या को देखते हुए राज्य सरकार ने 2016 को एक अध्यादेश लागू किया। अभी तक इसको लेकर कोई ठोस कानून नहीं है। लेकिन सरकार ने अध्यादेश लागू किया है जो मुख्य कानून के रूप में है।

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