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अस्पताल में रात को स्टाफ नहीं मिला, इसलिए हुई प्रसूता की मौत

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | बेगूं/जावदा

देवपुरा गांव में तीन दिन पहले हुई एक प्रसूता की मौत एक बार फिर इस इलाके के पिछड़ेपन का दर्द बयां कर गई। जहां सरकारी योजनाएं व सुविधाएं अभी भी लोगों की पहुंच से दूर है। मोबाइल का नेटवर्क काम नहीं करता और रात के समय अस्पताल में स्टाफ नहीं मिला। इस कारण सही जगह और समय पर प्रसव नहीं हो पाया। महिला की मौत हो गई।

देवपुरा निवासी प्रसूता समुंदर देवी प|ी हेमराज भील की 18 मई को हुई मौत के मामले में विभागीय जांच अभी पूरी नहीं हुई। अब तक की पड़ताल में यह सामने आया कि रात में प्रसव पीड़ा होते ही परिवार उसे जावदा की पीएचसी पर लाया। आदर्श पीएचसी होते हुए भी स्टाफ की कमी से कोई कर्मचारी नहीं मिला। इस कारण इधर उधर भटकने के बाद परिवार एक सेवानिवृत मलेरिया कर्मचारी की क्लिनिक पर पहुंचा और वहां प्रसव करवाया। लगभग इतनी ही देरी व परेशानी बीएसएनएल का नेटवर्क नहीं होने से हुई। इसी कारण प्रसव के समय व उससे पहले डॉक्टर, कंपाउंडर या 108 एंबुलेंस से भी संपर्क नहीं हो पाया। डॉक्टर व कंपाउंडर दोनों प्रसव पीडि़ता को अपने घर पर लाने की बात से मना कर रहे हैं। भास्कर ने डॉक्टर, कंपाउंडर व पीड़ित परिवार से बात की तो इसमें यह बात भी निकल कर आई कि यहां आदिवासी परिवार कंपाउंडर को भी डाक्टर समझते हैं। आदर्श पीएचसी केवल एक डाक्टर व दो कंपाउंडर के भरोसे हैं।

मुझे कोई जगाने नहीं आया ... पीएचसी में स्टाफ की कमी है। फिर भी अस्पताल के बाहर नंबर लिखे है। काॅल पर स्टाफ या मैं उपलब्ध रहता हूं। शुक्रवार रात मैं मेरे घर पर ही था। मुझे कोई उठाने नहीं आया। कोई आते तो रोगी खासकर प्रसूता को अवश्य अटेंड किया जाता। स्टाफ को भी बुलाता। परिवार ने 108 पर भी काॅल नहीं किया। अब नेटवर्क नहीं था तो मेरी इसमें मेरा क्या कसूर। महिला को अधिक ब्लडिंग होने के बाद भी अस्पताल लाया जा सकता था। -डाॅ. सुधेश राघव, जावदा पीएचसी

मैं तीसरी मंजिल पर रहता हूं

शुक्रवार रात को मेरे घर पर कोई भी प्रसूता को लेकर नहीं आया। चिल्लाने व पत्थर फेंकने जैसी भी मुझे कोई आवाज नहीं आई। हालांकि मैं तो तीसरी मंजिल पर रहता हूं। फिर भी यदि कंकर फेंकते तो कहीं कांच पर भी तो लगे होते। फोन भी तो लगा सकते थे। या घंटी बजाते। सत्यनारायण राठौर, कंपाउंडर, जावदा पीएचसी।

हमारे लिए तो जो इलाज करे वही डॉक्टर

हम तो कंपाउडर को ही डॉक्टर मानते है। अस्पताल जाने के बाद हम सत्यनारायण राठौर के घर गए। आवाजें दी, चिल्लाएं, कंकर भी फेंके पर कोई नहीं जगा। हमें बताया गया कि यहां डाक्टर रहते हैं। अब डॉक्टर व कंपाउंडर में फर्क की हमें क्या पता। जो इलाज करे वहीं हमारे लिए डॉक्टर, वहीं भगवान है। हेमराज भील, मृतका का पति देवपुरा

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