मानव जीवन को संवारने के लिए यज्ञ रूपी आयोजन की नितांत आवश्यकता है। यज्ञ से धार्मिक प्रवृति का प्रादुर्भाव तो होता ही है, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यज्ञ वातावरण निर्मल बनाता है। ये बातें कतरासिन मठाधीश अनन्त विभुति स्वामी रामप्रपन्नाचार्य ने प्रखंड क्षेत्र के अग्नि गांव में चल रहे श्रीलक्ष्मीनारायण यज्ञ सह श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिन अपने प्रवचन में कहीं।
श्रोताओं को कथामृत का पान कराते हुए कहा कि कथा सुनना कोई महानता नहीं है, कथा सुनने की विधि सुस्थिर होनी चाहिए। सांसारिक मोहमाया से परे होकर एकाग्रता पूर्वक कथा श्रवण करने से कथा का रहस्य हृदय में अवस्थित होकर मानव जीवन को संवार देती है। कथा जीवन के व्यथा को मिटाकर निर्मल कर देती है। इसीलिए इसे कथामृत कहा जाता है। श्रीमद्भागवत भगवान के भक्तों की कथा है, जिसमें भक्तों द्वारा भक्ति के मार्ग पर चलकर भगवान को प्राप्त करने तथा अनुशासित जीवन का पालन कर भगवत प्राप्ति का सुलभ मार्ग बताया गया है। स्वामी जी ने कहा कि जो मानव धर्म की रक्षा करते हुए सामाजिक परिप्रेक्ष्य में अपने आप को ढाल लेता है, सच्चा मानव कहलाने का हकदार वही है।