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मात्र तीन कनीय कर्मचारियों के भरोसे है एेना और राजपुर में बीसीसीएल का चिकित्सालय

3 वर्ष पहले
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केंद्र व राज्य सरकार भले ही आम जनता के स्वास्थ्य के प्रति कई योजनाओं की घोषणा करें। लेकिन आम जनता इन सुविधाओं से कोसों दूर रह जाती हैं। ठीक उसी प्रकार मिनी र| कहे जाने वाली कंपनी बीसीसीएल भी सिर्फ घोषणाएं करती है। लेकिन अपने किए वादे पर अमल तक नहीं करती है। यहां तक कि भारतीय संविधान के सीएसआर का पालन भी नहीं करती है। जबकि कंपनी को ये निर्देश है कि वे आर्थिक लाभ के साथ सामाजिक दायित्व का भी निर्वहण करें। एना कोलियरी में राजापुर एना हॉस्पिटल बनवाया है। ताकि यहां के लोगों को चिकित्सा व्यवस्था मिल सकें। यहां तकरीबन तीस हजार की आबादी है। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

डॉक्टर का चैंबर तक नहीं है यहां

ऐना हॉस्पिटल का हाल यह है कि यहां एक आया व दो कामिन ही हॉस्पिटल को संभालती है। यहां डॉक्टर न के बराबर ही दिखाई देते हैं। ऐसे तो डॉक्टर एसके सिन्हा को इस हॉस्पिटल की जिम्मेवारी सौंपी गई है। लेकिन उनके भरोसे इसके अलावा तीन और हॉस्पिटल है, जिसमें गोधर, धनसार व रेस्क्यू हॉस्पिटल भी शामिल है। ऐसे में वे भी यहां कम ही दिखाई पड़ते हैं। यहां तक कि डॉक्टर चैम्बर भी नहीं है।

बीसीसीएल के जर्जर अस्पताल का दृश्य।

राजापुर व एना हॉस्पिटल की शिकायत मिली है। मैंने भी जायजा लिया है। इन बातों की लिखित शिकायत के अलावा सीएसआर सुविधाएं पुनः शुरू कराने की मांग की जाएगी। ताकि आम आदमी को भी ये लाभ मिल सके। बप्पी बाउरी, युवा सामाजिक कार्यकर्ता।

दवाओं के नाम पर करोड़ों रुपए का होता है भुगतान

अगर दवाओं की बात करें तो बीसीसीएल रेट कॉन्ट्रेक्ट के आधार पर दवाएं लेती हैं। जिसकी प्रक्रिया सेंट्रल हॉस्पिटल की कमिटी पूरी करती है। वहां से बीसीसीएल के सभी एरिया को डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है। एरिया से इन हॉस्पिटलों में दवाएं डिस्ट्रीब्यूट किया जाता है। इन दवाओं के एवज में बीसीसीएल कॉन्ट्रेक्टर को करोड़ों रुपये भुगतान करती है।

नहीं मिलती हैं दवाएं : स्थानीय लोगों का कहना है कि इन चिकित्सालयों में कभी भी गैर बीसीसीएल कर्मियों या उनके बच्चों का न तो इलाज होता है न ही उन्हें दवाइयां उपलब्ध कराई जाती हैं। यहां तक कि प्राथमिक चिकित्सा की सुविधा भी यहां नहीं मिलती हैं।

बीसीसीएल कर्मी भी हैं परेशान : आश्चर्य की बात है कि यहां बीसीसीएल कर्मी के परिवार को भी दवाइयां नहीं मिल पाती हैं। आलम ये है कि महज एक कामिन व एक स्टॉफ के भरोसे ही चिकित्सालय को छोड़ दिया गया है।

दीवारें भी होने लगी हैं जर्जर : अब तो हालात ऐसे हैं की अफसरों की अनदेखी की वजह से अस्पताल टूटकर बिखरने लगे हैं। हॉस्पिटल की दीवारें भी गिरने लगी हैं। इनकी न कभी रंगाई होती है न रिपेयरिंग। अफसरों की लापरवाही की वजह से बेड भी खत्म हो गए हैं। आलम ये है कि गंदगी फैल चुकी है। जबकि स्टाफ का कहना है कि इसकी जानकारी आला अफसरों को समय समय पर दी गई है।

नहीं रहते हैं डॉक्टर : अगर डॉक्टर की बात करें तो यहां डॉक्टर भी अपनी खानापूर्ति के लिए आते हैं। ये बात और है कि आसपास के लोगों ने आज तक डॉक्टरों को कभी देखा नहीं। विभाग के एक सीनियर अफसर का कहना है की जिस विभाग की ये बात है वे अफसर इन बातों से अनभिज्ञ रहते हैं। अगर वे ध्यान दे तो यहां की चिकित्सा व्यवस्था काफी हद तक सुधर सकती है।

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