पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • विद्यालय के नाम 3 बीघा जमीन, फिर भी बबूल के पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर हो रहे विद्यार्थी

विद्यालय के नाम 3 बीघा जमीन, फिर भी बबूल के पेड़ के नीचे पढ़ने को मजबूर हो रहे विद्यार्थी

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने के सरकार के प्रयास सिफर नजर आ रहे हैं। 5 वर्ष पूर्व वर्ष 2013 में सरकार ने भुसावर तहसील की ग्राम पंचायत मैनापुरा स्थित जोगियों का पुरा गढ़ी ब्राह्मण में राजकीय प्राथमिक संस्कृत विद्यालय खोला था। जिला प्रशासन की ओर से विद्यालय के नाम 3 बीघा सिवाय चक जमीन भी उपलब्ध करा दी।

बावजूद इसके वहां विद्यालय भवन की बात तो दूर जमीन की बाउंड्रीवाल तक नहीं कराई गई है। मजबूरन विद्यालय के बच्चों को बबूल के पेड़ के नीचे पढ़ना पड़ रहा है। बारिश के दिन तो क्लास लगना मुमकिन ही नहीं होता, वहीं तेज सर्दी या तेज गर्मी के दिनों में भी बच्चों की पढ़ाई मुश्किल ही हो पाती है। इतना ही नहीं विद्यालय में मात्र एक शिक्षक ही तैनात है, जिसे बच्चों को पेड़ के नीचे बैठा छोड़ सप्ताह में तीन या चार बार संकुल या नोडल केंद्र पर विद्यालय से तीन किलोमीटर दूर पोषाहार सूचना, डाक संबंधी कार्य के चलते जाना पड़ता है। इस दौरान भी बच्चों की पढ़ाई प्रभावित ही रहती है। परिणाम ये हैं कि सरकार ने बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से विद्यालय खोला था, लेकिन उन्हें शिक्षा ही नहीं मिल पा रही है। इस समस्या को लेकर इन बच्चों के परिजन भी चिंता में है कि किस प्रकार इससे निजात मिले।

भरतपुर. गढ़ी ब्राह्मण स्थित संस्कृत विद्यालय के बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ते हुए।

विद्यालय में पानी की भी नहीं है व्यवस्था

विद्यालय के नाम जमीन होने के बावजूद भवन तो है ही नहीं, इसलिए वहां बिजली की सुविधा तो ही नहीं सकती। लेकिन हैरत की बात यह है कि बच्चों के लिए पेयजल एवं शौचालय के भी इंतजाम नहीं हैं। बच्चों को घर पीने को पानी लाना पड़ता है और खुले जंगल में पेशाब या शौच के लिए जाना पड़ता है। इस संबंध में बच्चों के परिजनों ने कई बार शिकायत की लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

डिस्कॉम के जीएसएस में है कार्यालय

भवन विहीन विद्यालय होने के कारण इस स्कूल का कार्यालय निकट ही स्थित बिजली डिस्कॉम के जीएसएस में चलता है। संस्था प्रधान स्कूल की सामग्री का बक्सा, कुर्सी, टेबल आदि सामान जीएसएस में रखते हैं। इतना ही नहीं स्कूली बच्चों का पोषाहार पकाने के लिए रसोई भी नहीं है। वहीं गैस कनेक्शन नहीं होने के कारण खुले आसमान के नीचे लकड़ी-उपले आदि से चूल्हे पर पकाया जाता है।

ये बोले जिम्मेदार अधिकारी

5 साल में स्थानीय प्रशासन सहित शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को कई बार पत्र लिख चुका हूं, लेकिन कोई सुनवाई ही नहीं होती। हर बार मामला पेंडिंग में डाल दिया जाता है। अव्यवस्था से मैं खुद ही परेशान हो चुका हूं। - मंगलराम, संस्था प्रधान

परेशानी: 67 हजार रुपए शिक्षक पर खर्च, बच्चों की उपस्थिति शून्य

सरकार की ओर से हर माह 1 लाख रुपए से अधिक खर्च किया जाता है। करीब 67 हजार रुपए माह तो यहां नियुक्त शिक्षक के वेतन पर ही खर्च होता है। शेष राशि पोषाहार व अन्य पाठ्य सामग्री आदि व्यवस्थाओं पर। इसके बावजूद भी विद्यालय में मात्र 17 बच्चों का नामांकन है। जिनमें 10 छात्र एवं 7 छात्राएं हैं। लेकिन इनमें से भी रोजाना महज 8 से 10 बच्चे ही पढ़ने आते हैं। कभी-कभी तो मात्र 2-4 बच्चे ही पढ़ने आते हैं। इससे स्कूल के हालात का सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है।

मुझे मामले की जानकारी नहीं है। आपके हिसाब से यदि ऐसा है तो विद्यालय का मौका निरीक्षण करूंगा तथा जल्द ही विद्यालय के लिए भवन व अन्य संसाधन जुटाए जाएंगे। ताकि बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। -हरिओम गौतम, संभागीय संस्कृत शिक्षा अधिकारी

पिछले पांच सत्रों के नामांकन पर एक नजर

सत्र नामांकन

2013-14 24

2014-15 32

2015-16 27

2016-17 24

2017-18 17

खबरें और भी हैं...