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रेलवे के अफसर ही चलवा रहे हैं स्टेशन पर गैर कानूनी पार्किंग ठेका

3 वर्ष पहले
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जंक्शन संभवतः ऐसा पहला रेलवे स्टेशन होगा, जहां करीब एक साल से पार्किंग का अवैध ठेका चल रहा है। रोचक बात यह है कि पार्किंग पर्ची पर साफ लिखा है अनधिकृत ठेकेदार।

इस पर्ची के जरिये आगंतुकों से पार्किंग दरें भी तय रेट से 5 गुणा ज्यादा ली जा रही हैं। कोई, इसका विरोध करता है तो ठेका कर्मचारी लड़ाई-झगड़े पर उतारू हो जाते हैं। तय रेट से ज्यादा वसूली जा रही राशि का पैसा किन अफसरों की जेब में जा रहा है, यह जांच का विषय है। इस अवैध पार्किंग ठेके का पता तब चला, जब यह संवाददाता किसी काम से रेलवे स्टेशन पर गया। पार्किंग कर्मी से जब पार्किंग शुल्क को लेकर वाद-विवाद हुआ तो उसने गाड़ी बाहर निकालने अथवा नुकसान हो जाने तक के लिए कह दिया। इस दौरान जब संवाददाता ने ठेका कर्मी के हाथ में लगी पर्ची पढ़ी तो उसमें स्पष्ट लिखा था अनधिकृत ठेकेदार। इसकी पुष्टि करने के लिए दुपहिया वाहन लेकर संवाददाता गया तो ठेका कर्मी ने पार्किंग की दूसरी पर्ची दी। जिस पर अनधिकृत ठेकेदार जैसा कुछ नहीं लिखा था। पार्किंग शुल्क भी तय रेट के अनुसार ही था।

4 महीने से रेलवे को नहीं मिल रहा पैसा

जीएसटी लागू होने के कारण पिछले 4 महीने से रेलवे को पार्किंग ठेके की राशि नहीं मिल रही है। क्योंकि रेलवे ठेकेदार से जीएसटी के साथ ठेके की राशि जमा करवाने को कह रहा है। ठेकेदार जीएसटी के साथ पार्किंग ठेका राशि जमा कराने को तैयार नहीं है। इस तरह रेलवे को पार्किंग शुल्क से कोई पैसा नहीं मिल रहा है।

अधिकृत रसीद

दो तरह की पर्ची गलत, कार्रवाई करेंगेः विजय प्रकाश

इधर, कोटा में सीनियर डीसीएम विजय प्रकाश का कहना है कि रेलवे स्टेशन की पार्किंग में वाहनों के लिए दो तरह की पर्ची होना गलत है। अब तक हमें इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन अब जांच करवाकर नियमानुसार उचित कार्रवाई की जाएगी।

अनाधिकृत पार्किग रसीद

न ठेका निरस्त हुआ, न ही अमानत राशि मिली ः सिंह

ठेकेदार देवेंद्र सिंह का कहना है कि रेलवे में उसकी 1,15,200 रुपए की एफडीआर जमा है। लाइसेंस फीस भी नियमित जमा कराता आया हूं। रेलवे ने न तो ठेका निरस्त किया और न ही एफडीआर लौटाई है। इधर, ठेके की शर्त है कि जब तक नई निविदा पूरी नहीं होती है, तब तक वह पार्किंग छोड़कर नहीं जा सकता। उल्लेखनीय है कि भरतपुर रेलवे स्टेशन का पार्किंग ठेका 27 अप्रैल, 2017 को ही खत्म हो चुका है। ठेका नहीं छोड़ने की जाहिरा वजह यह बताई जा रही है कि पार्किंग में जो वाहन खड़े हैं, उन्हें आखिर किसके सुपुर्द किया जाए। क्योंकि कुछ वाहन तो एक सप्ताह तक की अवधि के लिए भी खड़े हैं। जबकि असल वजह, वाहनों से अवैध और अत्यधिक वसूली है। इधर, नया ठेका करने के लिए रेलवे ने इसी साल 26 मार्च को ई- टेंडर किए थे। इसकी इसकी अंतिम तिथि 2 मई, 2018 थी, लेकिन इस तारीख तक निविदा नहीं आई थी। इससे पहले रेलवे ने पार्किंग का ठेका 17 जनवरी, 17 को चार थोक जघीना निवासी देवेंद्र सिंह को कोटेशन के आधार पर 3 माह के लिए दिया था। 27 अप्रैल को ठेका समाप्त हो गया।

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