चौ. चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सेवानिवृत्त ग्वार वैज्ञानिक डॉ. बीडी यादव ने कहा कि कपास उत्पादक क्षेत्रों में बीटी नरमा की लगातार बिजाई के कारण भूमि में पोषक तत्वों की कमी होती जा रही है, जिसके चलते किसान पूरी पैदावार नहीं ले पाते। वे गांव मेहुवाला व सरवरपुर में आयोजित जागरुकता शिविर में किसानों को संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि ग्वार बारानी क्षेत्रों की एक महत्त्वपूर्ण फसल है और यह खरीफ की एक मुख्य फसल जानी जाती है। यह सूखे को सहन करने की काफी क्षमता रखती है। जिन खेतों में ग्वार फसल बोई गई है। उसके बाद बिजाई की गई गेहूं तथा सरसों की फसल में 20 से 25 प्रतिशत नेत्रजन की बचत होती है। गेहूं व सरसों की फसल की पैदावार भी अधिक मिलती है। उन्होंने कहा कि ग्वार एक दलहनी फसल होने के नाते वायुमंडल से नाइट्रोजन लेकर पौधों को देती है। ग्वार की फसल पकने पर इसके पत्ते झड़कर जमीन पर गिरकर जैविक खाद का काम करते है। नरमे की फसल को ग्वार के फसल चक्र में रखना किसान के लिए बहुत हितकारी है।
ग्वार विशेषज्ञ डॉ. बीडी यादव ने उखेड़ा रोग को ग्वार फसल की एक मुख्य बीमारी बताया। इससे पैदावार में काफी कमी आ जाती है। इसकी रोकथाम के लिए 3 ग्राम कार्बेंडाजिम 50 प्रतिशत प्रति किलो बीज की दर से सुखा उपचारित करने के बाद ही बिजाई करने पर जोर दिया। ऐसा करने से 80 से 95 प्रतिशत इस रोग पर काबू पाया जा सकता है। इस अवसर राजेश राठौर, नंबरदार विजय सिंह, नरेंद्र सिंह, राकेश, कृष्ण, दलीप सिंह, भगीरथ, कान्हाराम, महेंद्र सिंह, ओम प्रकाश आदि मौजूद थे।
भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने में ग्वार की फसल फायदेमंद