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छात्रसंघ अध्यक्ष बनाए गए 58 प्रतिशत टॉपर्स के रिजल्ट गिरे, छात्रहित के काम करवाने में भी पीछे

3 वर्ष पहले
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राज्य सरकार ने टॉपर्स छात्रों को छात्रसंघ की कमान दी है, लेकिन यह उन्हें रास नहीं आ रही है। इसका सीधा प्रभाव उनके परिणाम पर पड़ रहा है। इसकी पुष्टि दुर्ग विश्वविद्यालय से पिछले दिनों जारी 57 कक्षाओं के नतीजे से हो रही है। इसमें से 18 कॉलेजों के पदाधिकारियों के अंक बढ़े हैं, लेकिन 22 पदाधिकारियों के अंक कम हुए हैं और तीन को बैक लगा है। इस तरह 25 कॉलेजों के पदाधिकारियों के नतीजे खराब आए हैं।

परिणाम जारी होने के बाद ट्विनसिटी के कुल 58 कॉलेजों में से 38 कॉलेजों के पदाधिकारियों के परिणाम का आंकलन किया। 58.1 फीसदी के परिणाम खराब हैं।

59

कॉलेज हैं ट्विनसिटी में

भास्कर ने पूछा तो मिला जवाब

98 फीसदी पदाधिकारियों की छात्र राजनीति में रुचि नहीं

98 फीसदी छात्रसंघ अध्यक्षों का साफ कहना था कि उनकी राजनीति में कोई रुचि नहीं है। 78 फीसदी सचिवों को राजनीति पंसद नहीं है। शासन के आदेश का उन्होंने किसी तरह पालन किया। उनका कहना है कि उनको अपना भविष्य बनना है। राजनीति में समय देने के स्थान पर पढ़ाई में अपना ज्यादा ध्यान देना चाह रहे हैं। इसी वजह से उन्होंने सालभर में धरना प्रदर्शन और अन्य चीजों पर भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

कुछ को पता ही नहीं चला की वे छात्रनेता बन चुके है

ग्रामीण क्षेत्रों के कुछ ऐसे भी कॉलेज मिले की जहां के टॉपर छात्रों को यह पता ही नहीं था कि वे अपने कॉलेज में छात्रसंघ के पदाधिकारी हैं। उनका कहना था कि इस बारे में उनसे कभी कोई चर्चा भी नहीं की गई। कुछ सिटी के कॉलेज के पदाधिकारी भी शामिल है जिनको अपने छात्रनेता होने की बात पता ही नहीं।

57

पीजी कक्षाओं के रिजल्ट जारी हुए

18

पदाधिकारियों के अंक बढ़े

हमें जबरदस्ती नेता बना दिया

22

पदाधिकारियों के अंक कम हुए

59 फीसदी छात्र संघ अध्यक्ष सरकार के फैसले से खुश नहीं

सर्वे में हमने यह जानने की कोशिश की कि इस फैसले से उन पर क्या असर पड़ा? सर्वे की रिपोर्ट चौंकाने वाली थी। 98 फीसदी छात्र संघ अध्यक्ष किसी राजनीतिक दल से नहीं है। 78 फीसदी छात्र संघ सचिव को तो छात्र राजनीति पसंद ही नहीं और 59 फीसदी छात्र संघ अध्यक्ष सरकार के फैसले के विरोध में है। कहते हैं, पढ़ाकू बच्चों को छात्र राजनीति में नहीं लाना चाहिए था। इससे उनकी पढ़ाई पर असर पड़ेगा।

03

पदाधिकारियों को लगा बैक

एक साल में साइंस कॉलेज को छोड़ कहीं भी कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ

प्रावीण्य सूची के आधार पर चुने गए छात्र नेता न तो किसी धरना-प्रदर्शन और बड़े आंदोलनों में शामिल हुए और नही उसका नेतृत्व ही किया। इसकी वजह से छात्रों की समस्याएं ज्यों की त्यों बनी रहीं और शैक्षणिक संस्थानों में किसी तरह के प्रदर्शन नहीं हुए। साइंस कॉलेज दुर्ग कैंपस में प्रस्तावित ऑडिटोरियम को हटाने की मांग को छोड़ कोई बड़ा प्रदर्शन नहीं किया।

सबसे ज्यादा दुर्ग-भिलाई प्रभावित

3 साल तक कॉलेज-यूनिवर्सिटी में छात्रसंघ चुनाव कराने के बाद इस साल सरकार ने मनोनयन को अपनाया है। राजनीतिक फायदे की दृष्टि से लोग इस फैसले को देख रहे हैं। तीन साल तक चुनाव के बाद मनोनयन हो गया है। 85 प्रतिशत कॉलेजों में छात्राओं को अध्यक्ष की जिम्मेदारी है। सबसे ज्यादा दुर्ग-भिलाई के कॉलेज इस फैसले से प्रभावित हुए।

फिलहाल बीएससी, बीए, बीकॉम की चल रही परीक्षा

दुर्ग विश्वविद्यालय ने अभी सेमेस्टर कक्षाओं यानी स्नातकोत्तर कक्षाओं के नतीजे जारी किए हैं। इसमें यह परिणाम सामने आया है। अभी बीए, बीकॉम और बीएससी कक्षाओं की वार्षिक परीक्षाएं चल रही हैं। इस परीक्षा में विभिन्न कॉलेजों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और सहसचिव पद पर रहते हुए कॉलेज का नेतृत्व करने वाले छात्र-छात्राएं शामिल हैं। उनकी अभी परीक्षाएं चल रही हैं।

कैसे किया सर्वे: जिनके नतीजे आए, सबसे पूछा

भास्कर संवाददाता ने हर उस छात्रनेता से बातचीत की जिनके रिजल्ट आ चुके हैं। उनसे पांच सवाल पूछे गए। अंकों की पड़ताल की गई। फिर पिछले सालों के आंकड़ों से इसकी तुलना की गई। इसके आधार पर जो आंकड़े निकले, उसे कंपाइल किया गया। इससे जो खुलासा हो रहा है उसके मुताबिक छात्रों का रिजल्ट गिरा है।

इस साल शासन ने निर्णय नहीं लिया है

छात्रसंघ चुनाव पर इस साल हमने कोई निर्णय नहीं लिया है। इस पर चर्चा होगी। और जो भी बेहतर निर्णय होना चाहिए वह लिया जाएगा। प्रेमप्रकाश पांडेय, उच्च शिक्षा मंत्री, छत्तीसगढ़ शासन

कम से कम आए दिन होने वाले हंगामे बंद हुए

शिक्षा विद् डॉ. डीएन शर्मा का कहना है कि शासन ने जो छात्रों के भविष्य के लिए बेहतर काम किया है। राजनीतिक पार्टियों के हस्तक्षेप से कॉलेज कैंपस का माहौल खराब होता था। जो छात्र राजनीति में नहीं होते थे उन छात्रों का ज्यादा नुकसान होता था। अन्य पार्टियों के कारण कॉलेज में आए दिन हंगामा और प्रदर्शन होते थे। जिस पर लगाम लग चुका है। हांलांकि लोकतंत्र के लिए यह कितना अच्छा और खराब है यह बहस का विषय है।

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