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व्रत रखकर पति की दीर्घायु के लिए वट वृक्ष की पूजा कर की परिक्रमा, शाम को फलाहार

3 वर्ष पहले
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अखंड सौभाग्य की कामना का पर्व वट सावित्री मंगलवार को मनाया गया। इस अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने सुबह से कड़ा व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा की। मुहूर्त के हिसाब से दोपहर 12 बजे से पूजा शुरू हुई। इस दिन महिलाओं ने सुबह स्नान के बाद नए वस्त्र पहनकर, सोलह शृंगार किया। पूजन की सामग्री को एक टोकरी में रखकर वट (बरगद) वृक्ष के नीचे पहुंची। जहां सबसे पहले सत्यवान और सावित्री की प्रतिमा स्थापित की। फिर धूप, दीप, रोली, भिगोए चने, सिंदूर आदि से पूजन किया। फिर वट वृक्ष की 11 व 21 बार परिक्रमा की। पति के स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुखी दांपत्य जीवन और संतान के लिए सुख, समृद्धि की कामना की। पूजा स्थल पर ही पंडितों से सावित्री और सत्यवान की कथा सुनी। अंत में नीबू व शक्कर से बने शरबत और चने का प्रसाद ग्रहण किया। दुर्ग-भिलाई समेत गांवों में महिलाओं ने पूजा की।

भिलाई के सेक्टर-6 में सुहागिन महिलाएं सोलह शृंगार कर वट वृक्ष की पूजा करने पहुंची।

सुहाग पर आए संकट होते दूर: पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन ही सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प और श्रद्धा से यमराज द्वारा अपने मृत पति सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। जो स्त्री सावित्री के समान यह व्रत करती हैं, उसके पति पर भी आने वाले संकट इस पूजन से दूर होते हैं।

धमधा में वट वृक्ष की परिक्रमा करती महिलाएं।

पुरुषोत्तम मास आज से, पूजा-पाठ, यज्ञ कर्म होंगे फलित

भिलाई| पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तीन वर्ष पर इस बार मलमास का योग बना है। इस वर्ष का मलमास 16 मई से 13 जून तक रहेगा। हर तीन साल में एक बार एक अतिरिक्त माह का प्राकट्य होता है, जिसे अधिकमास, मल मास या पुरुषोत्तम मास के नाम से जाना जाता है।

हिंदू धर्म में इस माह का विशेष महत्व है। संपूर्ण भारत में लोग इस पूरे मास में पूजा-पाठ, भगवद् भक्ति, व्रत-उपवास, जप और योग आदि धार्मिक कार्यों में संलग्न रहते हैं। माना जाता है कि अधिकमास में किए गए धार्मिक कार्यों का किसी भी अन्य माह में किए गए पूजा-पाठ से 10 गुना अधिक फल मिलता है।

हर 3 साल में इसलिए आता है मलमास

आचार्य मोनु महाराज ने बताया कि भारतीय गणना पद्धति के अनुसार प्रत्येक सूर्य वर्ष 365 दिन और करीब 6 घंटे का होता है, वहीं चंद्र वर्ष 354 दिनों का माना जाता है। दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर होता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 1 मास के बराबर हो जाता है। इसी अंतर को समाप्त करने के लिए हर तीन साल में एक चंद्र मास अस्तित्व में आता है, जिसे अतिरिक्त होने के कारण अधिकमास का नाम दिया गया है।

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