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बेडशीट के लिए 10 रुपए नहीं दे सका तो जिला अस्पताल ने लावारिस वार्ड में एडमिट कर दिया, बेड भी टूटा, 20 दिन से बेडशीट नहीं बदला

3 वर्ष पहले
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जेब में 10 रुपए नहीं होना, चिकित्सा सुविधा के लिए उमदा अस्पताल में कितना दर्दनाक हो सकता है, इसे वहां के लावारिश वार्ड में भर्ती रवि बारी महसूस कर रहा है। जिला अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर 20 दिनों में उसका सरका कूल्हा तक नहीं बैठा पाए हैं। हद तो यह कि वार्ड के जीर्ण-शीर्ण बेड पर बिछाने के लिए उसे बेड सीट तक नहीं दी गई है।

ये हाल है दुर्ग के जिला अस्पताल का। जहां भर्ती मरीजों से दस रुपए बेड चार्ज लिए जाने की व्यवस्था है। इस दस रुपए के एवज में मरीजों को अस्पताल बेड, बेड सीट, तकिया देता है। रवि को लावारिश वार्ड में रखा है।

रवि बारी

सड़क हादसे में कट गया था हाथ, तब से है भर्ती

मरीज से पूंछने पर बताया कि, वह रवि बारी है। ओड़िसा में घर है। लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में वह लावारिश मरीज है। 28 अप्रैल को हुए सड़क हादसे में उसका एक हाथ कट गया। गंभीर अवस्था में भर्ती कराया गया। अस्पताल के एक्सपर्ट्स डॉक्टर अबतक उसके हाथ की मलहम-पट्टी कर दिए पर सरका कूल्हा अबतक नहीं बैठा पाए हैं। उपचार अस्पताल में जारी है।

पट्‌टी बदलने 4 िदन का रहता है इंतजार

दस दिनों से वह बिना बेड सीट के बेड पर सोता है। बताता है कि सबके छोटे घाव की भी पट्टी जहां दो दिनों में बदल दी जाती है, वहीं उसके कटे हाथ की पट्टी बदलने के लिये उसे चार दिनों का इंतजार करना पड़ता है। लावारिश वार्ड में पंखा, एक्जास्ट लगा है। बाकी सुविधा उसे नहीं मिल रही है।

जमीन में घसीटकर जाते हैं पानी लाने

रसूखदारों, पहुंच वालों के लिए अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टर चाहे जितना योग्य व काबिल हो, रवि बारी जैसे लावारिशों के लिए उनकी काबलियत सवालों के घेरे में हैं। 20 दिनों में उसका कटा हाथ ठीक करना तो दूर की बात उसका सरका कूल्हा तक नहीं बैठा पाए हैं। रवि अपने पास 8 से 10 पानी की बोतल रखता है। पानी खुद लाता है।

ऐसा है सरकार का सिस्टम

ओड़िसा का रहने वाला है मरीज रवि बारी, हादसे में कुल्हे में लगी चोट, हड्‌डी जोड़ने के बजाए कर दी मरहम पट्‌टी

सीधी बात|डॉ. केके जैन, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल

मैं खबर लेता हूं, देंगे बेडसीट...

लावारिश मरीजों को आप खाना देते हैं, पर बेड सीट नहीं? नहीं, हम बेड सीट सबको देते हैं, तीमारदार नहीं रहने पर वह उसे फेंक देते हैं।

क्या ऐसा है कि रवि नाम के मरीज की जेब में दस रुपया नहीं था तो उसे बेड सीट नहीं दी गई ? नहीं, पैसे की कोई बात नहीं है, अगर किसी अन्य वजह उसे बेड सीट नहीं दी गई तो मैं अवश्य दिला दूंगा।

लावारिश मरीजों के देखभाल ऐसा ही होता है क्या? चूक नहीं हुई है। सिधानी दरबार संस्था के लोग ऐसे ही लोगों की मदद करते हैं। अब ऐसा नहीं होगा।

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