जून में होने वाली ई जीरो परीक्षा कर्मियों के लिए केवल झुनझुना मात्र है। इससे उन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला। मामला कोर्ट में होने की वजह से प्रबंधन ने अपने को बचाने के लिए सात साल बाद ई जीरो परीक्षा की प्रक्रिया शुरू की है।
सेल प्रबंधन पर यह आरोप बीएसपी वर्कर्स यूनियन की कार्यकारिणी की बैठक में सदस्यों ने लगाया। सदस्यों का कहना है कि पूर्व में संयंत्र कर्मी को बिना किसी परीक्षा के उनके सीनियारिटी के आधार पर साक्षात्कार ले कर अधिकारी बनाया जाता था। जिसमें कर्मी की लंबी सेवा ही इसका मुख्य आधार होता था। बाद में 2008 से इसमें लिखित परीक्षा को जोड़ा गया। जिस कारण पुराने कर्मियों को निराशा हुई क्योंकि नए कर्मियों के सामने पुराने कर्मियों का लिखित में सामना करना मुश्किल होने लगा।
एनजेसीएस यूनियन संदेह के दायरे में
वर्ष 2008 में लिखित परीक्षा के लिए पॉलिसी बनी थी तो उसमें दो बातों को शामिल किया गया था। पहला परीक्षा का आयोजन हर 2 वर्ष में किया जाएगा। दूसरा पात्र कर्मियों के 10 प्रतिशत कर्मियों को अधिकारी बनने का अवसर दिया जाएगा। इसके बाद 2010 में परीक्षा का आयोजन किया गया तथा इसके बाद प्रबंधन ने अचानक परीक्षा का आयोजन बंद कर दिया। जिससे कर्मचारियों के अधिकारी बनने का रास्ता बंद हो गया। दूसरी तरफ प्रबंधन ने नए अधिकारी की सीधी भर्ती एमटीटी के रूप में जारी रखी।
महज 2 प्रतिशत कर्मी ही बन सकेंगे अफसर
इसके बाद 2018 में नई पॉलिसी बना कर दोबारा ई जीरो की परीक्षा का आयोजन किया गया। जिसमे पात्र कर्मियोंं के 10 प्रतिशत प्रमोशन से घटा कर 2 प्रतिशत कर दिया गया। चूंकि कुछ जागरूक कर्मी ई जीरो की मांग को लेकर हाईकोर्ट पहुंच गए हैं तो प्रबंधन मात्र अपने आप को बचाने के लिए 2 प्रतिशत कर्मियों को अधिकारी बनाने की नीति से परीक्षा का आयोजन कर रही है।
नए को मौका देने से पुराने कर्मियों में घबराहट
प्रबंधन ने सबको खुश करने पात्रता की न्यूनतम ग्रेड एस 8 से घटा कर एस 6 किया। बीएसपी वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष उज्जवल दत्ता ने कहा की पात्र कर्मियों के मात्र 2 प्रतिशत को मौका देकर संयंत्र प्रबंधन ने कर्मियों के साथ धोखा किया है। इस प्रकार की नीति से वर्षों से अधिकारी बनने का सपना रखने वाले योग्य कर्मियों को बहुत निराशा हुई है। बीएसपी वर्कर्स यूनियन इसका विरोध करती है।