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स्पेशल बच्चों को मिली लाठी तो बनाई बांसुरी, हल, बेलन, झाड़ू और स्ट्रेचर, फिर उसके उपयोग बताए

3 वर्ष पहले
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स्पेशल बच्चों को लाठी देकर पूछा गया कि इसके क्या क्या उपयोग हैं, बताइए। तो बच्चों ने उस लाठी के कई सारे उपयोग बताए। किसी ने हल बनाकर खुद को किसान बताया तो किसी ने झाड़ू का रूप देकर खुद को मोदी कहा। बांसुरी बनाकर मोहन बने, तो उस लाठी को बच्चा बनाकर लोरी सुनाई। चूल्हा जलाकर खाना पकाया। बच्चों के एक समूह ने मिलकर उसका स्ट्रेचर बनाया। उससे मरीज को अस्पताल पहुंचाने का शानदार अभिनय किया।

यह सब हो रहा है स्वयंसिद्धा ग्रुप की ओर से चल रही एक्टिंग की वर्कशॉप में। यहां शाम के समय स्पेशल बच्चों को एक्टिंग की बारीकियां बताई जा रही हैं। बच्चे भी इसमें अपनी क्रिएटिविटी दिखा रहे हैं। शुक्रवार को बच्चों को स्वयंसिद्धा ग्रुप की सोनाली चक्रवर्ती और प्रशिक्षक शिवदास घोड़के और उनके सहयोगी नीशू पांडेय ने बच्चों को एक लाठी दी। उसका अपने मन से उपयोग करने कहा। साथ ही उसके पीछे लाठी का उपयोग भी बताना होगा। तब बच्चों ने लाठी लेकर उसके साथ अपने विभिन्न रूप दिखाए।

वर्कशॉप में बच्चे अपनी क्रिएटिविटी भी दिखा रहे

कार्यशाला में स्पेशल बच्चों ने स्ट्रेचर बनाकर बच्चों को आसानी से उठा लिया।

बच्चों ने डॉक्टर और मरीज बनकर किया ट्रीटमेंट का प्रदर्शन

बच्चों को इस क्रिएटिव वर्क के बाद एक नाटक प्ले करने के बारे में बताया गया। उसमें एक को डॉक्टर, तीन को नर्स और वार्ड ब्वॉय, एक को मरीज और दो को उनके परिजन बनाए गए। इसके बाद स्पेशल बच्चों को स्क्रिप्ट दी गई। डायलॉग याद करने के बाद बच्चों ने सड़क हादसे में घायल मरीज के उपचार करना और घायलों की सहायता करने वाले प्ले का अभिनय किया। एक्टिंग के दौरान बच्चों ने जो गलतियां की, उसे बताया गया। इसे उन्होंने सुधारा।

बेटी को स्वयंसिद्धा बनाने की दी प्रेरणा

इससे पहले दोपहर में हुई वर्कशॉप में अभिनय गुरु घोड़के और उनके सहयोगी पांडेय ने महिलाओं को अलग-अलग थीम दिए। उसे 5-5 मिनट के भीतर उसकी कहानी प्रस्तुत करने को कहा गया। इसमें एक ग्रुप ने दो अलग-अलग लड़कियों की कहानी बताई। इसमें एक अभिभावकों को दिखाया जो अपनी बेटी को ओवर कैरिंग में रखते हैं। घर में ही उसकी सुविधा का ख्याल रखते हैं। इससे वह डरपोक बन गई और किसी भी परिस्थिति से घबराते रहती है। वहीं एक अभिभावक के माध्यम से बेटी को सशक्त बनाते हुए दिखाया गया। उसे पढ़ाने-लिखाने समझदार बनाने के साथ उसे हर परिस्थिति से लड़ने के लायक बनाया गया। इस नाटक से बताया कि बेटी को सभी तरह से सक्षम बनाएं ताकि वह सभी परिस्थितियों को सामना कर सके।

वृद्धाश्रम के दर्द को मां के माध्यम से किया बयान

अस्तित्व शीर्षक के नाम से महिलाओं को एक अलग थीम दिया गया। इसमें महिलाओं ने वृद्धाश्रम के दर्द को एक मां के माध्यम से बयां किया। कैसे एक मां ने अपने बेटे को बड़ा किया। बेटा ने बड़े होने के बाद अपनी मां को वृद्धाश्रम में पहुंचा दिया। उसका हाल चाल तक पूछने के लिए उसके पास समय नहीं रहा। वह सिर्फ आश्रम में समय समय पर पैसे भेजते रहा,लेकिन मां से नहीं मिला। फिर भी मां का मन हमेशा बेटे की भलाई और उसकी सुख के लिए चिंतित रहा। हर पल वह बेटे के लिए शुभकामनाएं देती रही।

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