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कर्म और ज्ञान के साथ भक्ति का योग जरूरी तब हो सकती है भगवत प्राप्ति: गोपिकेश्वरी

3 वर्ष पहले
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कालीबाड़ी मैदान, वैशाली नगर में चल रहे दिव्य आध्यात्मिक प्रवचन में जगद्गुरुत्तम् कृपालु महाराज की शिष्या गोपिकेश्वरी देवी ने कर्म, ज्ञान और भक्तिमार्ग की विवेचना की। उन्होंने बताया कि कर्म और ज्ञान में भक्ति का योग आवश्यक है।

भगवत प्राप्ति के 3 प्रमुख मार्गों में प्रथम दो-कर्म व ज्ञान है। इनके संबंध में शास्त्रों में निंदा और स्तुति पूर्ण बातें आती हैं। कोरा कर्म और कोरा ज्ञान दोनों निरर्थक है। कर्म मार्ग में तमाम तरह के नियम हैं, जो कि इतने कड़े हैं कि कलियुग में उनका पालन सर्वथा असंभव है।

देवी गोपिकेश्वरी ने बताया, कर्म और ज्ञान में जब हम कृष्ण भक्ति जोड़कर उसे कर्मयोग और ज्ञानयोग बना लेते हैं, तब वह हमको माया से पार कराने में सक्षम होता है। जो कर्म करें, वह कृष्ण को समर्पित हो जाए, यह कर्मयोग है। ज्ञानी को भी कृष्ण भक्ति करनी पड़ती है, नहीं तो मोक्ष नहीं मिलता। इस प्रकार कर्म और ज्ञान नियमों में बंधे हुए हैं।

कालीबाड़ी मैदान में कथा सुनने पहुंची महिलाएं। इनसेट: देवी गोपिकेश्वरी।

कर्मयोग, सन्यास से होता है श्रेष्ठ
कर्म योग अर्थात हम शरीर से कर्म तो करें, लेकिन मन कृष्ण में लगा रहे, तो वे कर्म ईश्वर को समर्पित हो जाएंगे। वहीं कर्म सन्यास में कर्मों से पूरी तरह सन्यास लिया जाता है, और ईश्वर भक्ति की जाती है। यह भी अंतःकरण को शुद्ध कर भगवान का प्राप्त करा देता है। कर्मयोग श्रेष्ठ माना गया है।

भक्ति सभी जीवों का है अधिकार
गोपिकेश्वरी ने कहा कि तीन मार्गों में सबसे प्रमुख है भक्ति मार्ग। यह भगवान को सबसे प्रिय है। भक्ति की बहुत बड़ी महिमा है। इसे किसी का आश्रय नहीं चाहिए। यह जीव के त्रिगुण, त्रिकर्म, त्रिदोष, पंचक्लेश, पंचकोश आदि माया के बंधनों को नष्ट कर देती है। और सदा के लिए भगवान की सेवा प्राप्त करा देती है। भक्ति का अधिकार सभी जीवों को है।

जगद्गुरुत्तम् कृपालु महाराज का दिया परिचय
आदि जगदगुरु शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निंबार्काचार्य और माध्वाचार्य के बाद कृपालु महाराज ऐसे पांचवें महापुरुष हुए हैं, जिन्हें मौलिक जगदगुरु की उपाधि मिली है। काशी विद्वत परिषद ने 14 जनवरी 1957 को इन्हें यह उपाधि प्रदान की थी, तब ये 34 वर्ष के थे। भक्ति योग रसावतार व निखिल दर्शन समन्वयाचार्य की दो ऐतिहासिक उपाधियां भी उन्हें प्राप्त हैं। कृपालु महाराज को सभी विद्वानों द्वारा ‘जगद्गुरुत्तम्’ स्वीकार किया गया है।

आज महाआरती के बाद खेलेंगे फूलों की होली
31 मार्च से शुरू हुए प्रवचन श्रृंखला का समापन शनिवार को होगा। अंतिम दिन प्रवचन के बाद जगद्गुरुत्तम् कृपालु महाराज की चरण-पादुकाओं का पूजन होगा। उनकी पादुकाएं सबके समक्ष रखी जाएंगी। श्रीराधाकृष्ण की महाआरती होगी। अंत में गोपिकेश्वरी देवी भक्तों के ब्रज की प्रसिद्ध फूलों की होली खेल प्रवचन का समापन करेंगी।

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