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विंडो पीरियड में एचआईवी का पता लगाना कठिन

3 वर्ष पहले
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दुनिया में कहीं पर भी ब्लड ट्रांसफ्यूजन 100 प्रतिशत सुरक्षित नहीं है। चाहे जितनी भी जांच ब्लड चढ़ाने के पहले क्यों न कर ली जाए। उसमें भी विंडो पीरियड में एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी के संक्रमण का खोज करना काफी दुष्कर कार्य होता है एवं किसी भी स्थिति में तत्काल एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी के संक्रमण का खोज करना संभव नहीं हो सकता। देश अथवा विदेश के अच्छे से अच्छे ब्लड बैंक में भी विंडो पीरियड के कारण एचआईवी हेपेटाइटिस बी के मरीज मिलते ही हैं।

यह दावा करते हुए थैलेसीमिया वेल्फेयर सोसाइटी के महासचिव प्रमोद पुरी ने बताया कि विश्व के किसी भी स्थान में ब्लड ट्रांसफ्यूजन 100 प्रतिशत सुरक्षित नहीं है। क्योंकि संक्रमण की एक ऐसी अवधि जब ब्लड टेस्ट में संक्रमण नहीं दिखाता है।

विश्व के किसी भी स्थान पर ब्लड ट्रांसफ्यूजन 100 प्रतिशत सुरक्षित नहीं, रिसर्च की जरूरत

दुर्घटना व विभिन्न बीमारियों के लिए होती है ब्लड की आवश्यकता

सिर्फ 7 दिनों तक रख सकते हैं सीमित

ब्लड ट्रांसफ्यूजन के पहले संक्रमण की आशंका के मद्देनज़र ब्लड के प्रत्येक इकाई का आवश्यक परीक्षण किया जाता है, हेपेटाइटिस ए, बी, सी तथा एचआईवी आदि के वायरस ब्लड टेस्ट में विंडो पीरियड के दौरान पकड़ में नहीं आते। विंडो पीरियड वह अवधि है जिसमें रक्तदाता के ब्लड में एचआईवी तो आ चुका रहता है परंतु वह ब्लड टेस्ट में नहीं दिखाई देता। परीक्षण की लेटेस्ट टेक्नोलॉजी “न्यूक्लेइक एसिड एम्प्लीफिकेशन टेस्ट” भारत के चंद स्थानों में ही उपलब्ध है। विंडो पीरियड को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता।

17 महीने में 2234 लोग एचआईवी संक्रमित

वर्ष 2016 में सामाजिक कार्यकर्ता चेतन कोठारी द्वारा जनसूचना अधिकार के तहत राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन से जानकारी मांगी थी कि विंडो पीरियड में कितने लोग एचआईवी संक्रमित हुए। इस संदर्भ में नैको ने बताया कि गत 17 महीनों में ब्लड ट्रांसफ्यूजन के चलते इस विंडो पीरियड में भारत में लगभग 2234 लोग एचआईवी से संक्रमित हुए।

बीएसपी का ब्लड बैंक बना जीवनदायिनी

ब्लड की जरूरत दुर्घटनाओं से लेकर विभिन्न बीमारियों में आवश्यकता होती है। परंतु कुछ बीमारियों में जैसे थैलेसीमिया, सिकलिन आदि में इस ब्लड की आवश्यकता नियमित होती है। जिनमें ब्लड ट्रांसफ्यूजन से होने वाले संक्रमण का खतरा ज्यादा होता है। इस चिकित्सालय में कुछ थैलेसीमिया के ऐसे मरीज भी हैं जो कई सालों से नियमित रूप से ब्लड ट्रांसफ्यूजन करा रहे हैं तथा स्वस्थ हैं। बीएसपी के ब्लड बैंक में डोनेशन के तहत मात्र 0.2 से 0.5 प्रतिशत के मध्य एचआईव्ही संक्रमित ब्लड प्राप्त होता है।

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