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सीईटीपी में प्रतिदिन 90 लाख लीटर पानी होता है साफ, उपयोग नहीं हो पा रहा

3 वर्ष पहले
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शहर के वसुंधरा नगर स्थित एकीकृत जलशोधन संयंत्र (सीईटीपी) भिवाड़ी में फैक्ट्रियों से निकलने वाले दूषित पानी को साफ करने का संयंत्र है। फेज 1 से 5 तक के उद्योगों से निकला करीब 90 लाख लीटर पानी यहां साफ हो रहा है, लेकिन पानी की गुणवत्ता को लेकर सीईटीपी लगातार विवादों में घिरा रहता है। वर्ष 2002 में यह केवल पंपिंग स्टेशन था और इसे रीको चलाता था। जून 2007 में बीएमए व जिला प्रशासन और 2011 में यह जिम्मा सीधा बीएमए को दे दिया गया।

इसके बाद 2015 में सरकार ने सीईटीपी संचालन के लिए भिवाड़ी जल प्रदूषण निवारण नाम से 60 सदस्यों का नया ट्रस्ट बना दिया। अब ये ट्रस्ट व उद्योगों का पानी भिवाड़ी की लाइफ-लाइन से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गए हैं। काफी सवाल भी खड़े किए जाते रहे हैं। इन्हीं सवालों का जवाब तलाशने के लिए दैनिक भास्कर ने सीईटीपी चेयरमैन सतेंद्र सिंह चौहान से बातचीत की।

सतेंद्र सिंह चौहान

प्रश्न : सीईटीपी संचालन में मॉनिटरिंग में कमी, गुणवत्ता में कमी जैसे आरोप लगते रहे हैं, कितनी सच्चाई हैं इनमें? प्रदूषण मंडल के सीनियर अफसर तो यह तक कह गए कि इसे चलाना उद्यमियों के बस का नहीं।

उत्तर : सीईटीपी का संचालन भिवाड़ी जल प्रदूषण निवारण ट्रस्ट करती है। ट्रस्ट में चुनाव प्रक्रिया नहीं है। मैं वर्ष 2015 से चेयरमैन हूं। दो साल का कार्यकाल होता है। लगातार दो बार भी पद पर रह सकते हैं। 2019 तक मुझे ही संभालना है। बेहतर मॉनिटरिंग के लिए अब ट्रस्ट का संचालन एसपीवी (स्पेशल पर्सन व्हीकल) के तहत करेंगे। कुल 11 डायरेक्टर होंगे जो कंपनी की तरह इसे चलाएंगे। उक्त अधिकारी की टिप्पणी का आशय गलत लिया गया।

प्रश्न : सीईटीपी की क्षमता छह मिलियन लीटर पानी प्रतिदिन से नौ एमएलडी कर दी है। जबकि इसकी पर्यावरणीय स्वीकृति मिलनी अभी बाकी है?

उत्तर : हां यह सही है कि जरूरत के हिसाब से हमने इसकी क्षमता बढ़ा दी थी। अब कानूनी रूप से पर्यावरणीय स्वीकृति ली जा रही है। इसके तहत जनसुनवाई हो चुकी है।

प्रश्न : सीईटीपी में गड़बड़ी या खामी पर आम आदमी कैसे शिकायत कर सकता है? पानी का क्या उपयोग है?

उत्तर : आमजन का सीधा इससे कोई सरोकार नहीं है, लेकिन हमने कह रखा है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय इसकी जांच करा सकता है। इसका मैनुअल छपा हुआ है और हम फैक्ट्रियों को ये बांटते रहते हैं। इसमें फैक्ट्रियों का पानी आता है। शुद्धिकरण के बाद पाइप से इसे खुशखेड़ा में छोड़ देते हैं, लेकिन वहां से यह खुले नाले में पहुंचकर फिर खराब हो जाता है।

प्रश्न : सीईटीपी का संचालन बीएमए के अधीन होना चाहिए। दोनों ही उद्योग हित में काम करते हैं। दोनों में अंतर क्यों है ? संचालन का को कितना पैसा आता है और कहां से ?

उत्तर : नहीं ऐसा नहीं है। दोनों अलग-अलग चीजें हैं। इनका संचालन भी अलग ही होना चाहिए। संचालन के लिए पैसा औद्योगिक इकाइयों से आता है। मासिक खर्च करीब 70 लाख रुपये है। इसमें 40 लाख अधिक प्रदूषण करने वाली 25 कंपनियां देती है। शेष अन्य कंपनियां वहन करती हैं।

प्रश्न: पिछले दिनों सीईटीपी से नारंगी रंग का धुंआ निकलने से लोग घबरा गए थे, क्या लापरवाही रही?

उत्तर : वह केमिकल रिएक्शन था। किसी पात्र में पुराना केमिकल था। अन्य केमिकल डालते समय वह रिएक्शन से धुएं का गुबार उठा था। उस समय ठंड का मौसम था।

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