राजधानी में 30 साल से अधिक उम्र के 25 फीसदी युवा हाईपरटेंशन के शिकार
एकेडमिक प्रेशर और लाइफस्टाइल में हुए बदलावों की वजह से शहरी बच्चों में मोटापे और हाईपरटेंशन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, शहर में 30 साल से अधिक उम्र के लोगों में करीब 25% लोग इससे ग्रसित हैं। इसके लक्षण नजर नहीं आते हैं, जिसकी वजह से लोगों को पता ही नहीं होता कि वे लंबे समय से इसके शिकार हैं। डॉक्टर्स के पास पहुंचने वाले 40 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं, जो 15 से 20 साल का समय इस बीमारी की गिरफ्त में बिता देते हैं। जब बेहद क्रॉनिक कंडीशन में कुछ अन्य शिकायतें लेकर वे डॉक्टर के पास पहुंचते हैं, तो पता चलता है कि हाईपरटेंशन उन्हें लंबे समय से है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने भी दुनियाभर में होने वाली असमय मौतों के लिए हाईपरटेंशन को सबसे मुख्य वजहों में से एक बताया है। वर्ल्ड हाईपरटेंशन डे पर शहर के डॉक्टर्स से हमने जाने लाइफस्टाइल में किस तरह के करेक्शन की है सबसे ज्यादा जरूरत।
वर्ल्ड हाईपरटेंशन डे आज
साइलेंट किलर की तरह होती है यह बीमारी
चाइल्ड स्पेशलिस्ट डॉ. आरके यादव के मुताबिक, हाईपरटेंशन या हाई ब्लड प्रेशर की समस्या से पीड़ित बच्चों के स्वभाव और सेहत दोनों पर ही बुरा असर पड़ता है। भारत में 57% स्ट्रोक डेथ्स और कोरोनरी हार्ट डिसीज से होने वाली मौतों के 24% मामलों में मुख्य वजह हाईपरटेंशन ही होती है। हाईपरटेंशन और इसके लक्षणों का सबसे गंभीर और खतरनाक पहलू यह है कि यह बीमारी साइलेंट किलर की तरह होती है। आमतौर पर इसके लक्षण सामने ही नहीं आते और बीमारी अंदर ही अंदर बढ़ती जाती है। अगर इसे नजर अंदाज किया गया या फिर समय से इसका इलाज शुरू नहीं हुआ, तो हार्ट का लेफ्ट साइड बड़ा या मोटा हो जाता है और फलस्वरूप हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि जब हाईपरटेंशन बहुत अधिक बढ़ जाती है, तब आपको सरदर्द और कई बार बेहोशी के दौरों से भी जूझना पड़ता है।
लाइफ स्टाइल डिसीज है
डॉ. पंकज मनोरिया ने बताया, हाईपरटेंशन दरअसल लाइफ स्टाइल डिसीज है। खान-पान की खराब आदतें, बढ़ रहा मोटापा और देर रात तक जागने की आदतों के कारण युवाओं में यह समस्या बढ़ रही है। यह बीमारी पहले 55 से 60 साल की उम्र में होती थी, लेकिन अब लाइफ स्टाइल में शामिल होती जा रही बैड हैबिट्स के कारण 25 से 30 साल की उम्र के युवाओं को भी यह हो रही है।