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नोटमंदी... शादी की खुशियों में नोटों की कमी का व्यवधान

3 वर्ष पहले
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साल आखातीज पर राजधानी में सैकड़ों शादियां होती हैं। हर तरफ धूम-धड़का। फिजा में संगीत। सभी शादी हॉल, मैरिज गार्डन आयोजन की रौनक से घिरे। कमोबेश भोपाल का हर दसवां परिवार शादी-ब्याह में व्यस्त, लेकिन इस साल, बाराती-घराती के चेहरे कुम्हलाए हुए हैं। माहौल बिल्कुल डेढ़ साल पहले की नोटबंदी जैसा। तब भी शादियों का मौसम था और एक झटके में ही हजार-पांच सौ के नोट बंद कर दिए गए थे। कहने को तो अब 2000 और 200 का नया नोट है, लेकिन 2000-200 के साथ 500-100 के भी नोट एटीएम मशीनों से ‘गायब’ हैं। नकदी नहीं होने से कई लोग परेशान हैं। ऐसा ही एक दर्द सोमेश शर्मा का भी है। वे उच्च मध्यम वर्गीय परिवार से हैं और मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते हैं। उनके भाई दीपक शर्मा की आज शादी है। शादी की रस्मों को पूरा करने और अन्य जरूरी खर्चों की पूर्ति के लिए उन्हें एक लाख रुपए की जरूरत थी। उन्हें भरोसा था, बैंक से पैसे मिल जाएंगे। इस भरोसे के चलते उन्होंने कई तरह की व्यवस्थाएं कर लीं। अदायगी की अग्रिम व्यवस्था के लिए सुबह 11 बजे बैंक में लगी लाइन को देखकर वे वापस लौट गए। दोपहर एक बजे तक नकदी लेने नौ एटीएम के चक्कर लगाए, लेकिन कहीं से भी उन्हें पैसा नहीं मिला। इस दौरान उन्होंने अपने दोस्तों से परेशानी शेयर की। दोस्त भी अलग-अलग क्षेत्रों के एटीएम से रुपए निकालने सक्रिय हुए आखिरकार एक निजी बैंक से उन्हें नकदी मिल गई। इस दौरान कुछ से रुपए भी उधार लिए। इस कवायद में उनके पांच घंटे बर्बाद हो गए। वे शहर में अकेले नहीं थे, जिन्होंने ये परेशानी उठाई। उन जैसे हजारों लोग मांगलिक आयोजन की खातिर यहां-वहां भटकते रहे।

सबका एक ही शिकवा, एटीएम से नकदी नहीं मिली। बैंकों ने भी बड़े नोट और ज्यादा रकम नहीं दी। ऐसे में मेजबान को आयोजन से जुड़े भुगतान को लेकर तनाव। मांगलिक आयोजन में मुखिया का पूरा ध्यान कि कहीं शादी और रस्मों, शगुन के लेन-देन के नाम पर उसकी समाज में किरकिरी न हो जाए। इसके चलते कई ने परिचितों से रुपए उधार लिए या बाजार से जरूरी खरीद-फरोख्त भी उधार में की। वहीं, बैंक भी अपनी मजबूरी बताते हुए जरूरतभर के बड़े नोट एक ही कस्टमर को देने में असमर्थता जताते रहे। ऐसे में कुछ लोग हास-परिहास में यह कहते नजर आए कि अब तो शगुन में चेक देना होगा। वहीं, कई लोग परेशानी के चलते सिस्टम को कोसते दिखाई दिए। कुछ बैंकों की ब्रांचों में सुनने को मिला कि मांग के अनुरूप नकदी नहीं मिल रही है। इस वजह से संकट पैदा हुआ। इन हालातों ने डेढ़ साल पुरानी नोट बंदी की याद दिला दी। लोगों की नाराजगी इस बात को लेकर भी रही कि भारतीय संस्कृति में अक्षय तृतीया पर शादी करने की परंपरा है। कमोबेश हर साल इस अवसर पर रुपयों की आवश्यकता खरीद-फरोख्त के चलते बढ़ जाती है। ऐसे में सरकार ने जरूरी नकदी का इंतजाम क्यों नहीं किया।

सवाल बरकरार: अब प्रश्न यह है कि सर्कुलेशन में पर्याप्त नकदी होने के बावजूद एटीएम में कैश क्यों नहीं है? क्या बड़ी संख्या में नकदी जमाखोरी की प्रवृत्ति विकसित हुई है? सरकारी बंदिशों के चलते बड़े लोगों ने सुनियोजित तरीके से बैंकों से पैसा निकाला और अपने पास रोक रखा है। बैंकों के पास नोटों की कमी करंसी छपाई में सुस्ती के कारण निर्मित हुई है। कुछ की निगाह में एनपीए का ग्राफ बढ़ना भी एक वजह है। अटकलें तो ये भी हैं कि एक साल से 2000 को नोटों का छपना लगभग बंद जैसा है। इसी तरह 200 के नोटों के लिए 50% एटीएम अपडेट नहीं हुए। अंदरखाने की मानें तो सोमवार को एक साथ दस लाख किसानों के खाते में सरकार द्वारा 1669 करोड़ रुपए जमा किए जाने से भी यह समस्या पैदा हुई है। उम्मीद है कि शहर में नोटों की कमी जल्द ही दूर होगी और 1022 एटीएम लोगों को मायूस नहीं करेंगे। Áअलीम बजमी

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