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जमीन के लिए कचहरी और अफसरों के चक्कर काटते-काटते दम तोड़ देता है साधु

3 वर्ष पहले
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एक आम आदमी कैसे कोर्ट-कचहरी, सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है और परेशान होता है। यही दिखाता है सोमवार को शहीद भवन में मंचित नाटक 1226/7। नाटक का शीर्षक किसी होटल के कमरे या किसी मकान नंबर से प्रेरित नहीं है। यह नंबर है एक साधु नाम के व्यक्ति की फाइल का। साधु इसी फाइल का नंबर लिए पिछले 9 साल से दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, लेकिन उसे इस समस्या का हल तो नहीं मिला, मिली तो सिर्फ मौत। इसका निर्देशन विशाल चतुर्वेदी ने किया। जिसकी प्रस्तुति रामकृष्ण रेपर्टरी ग्रुप के कलाकारों ने दी। मोहन राकेश की कहानी पर आधारित इस नाटक का लेखन जितेंद्र मित्तल ने किया। रंग-ए-शांति समारोह के तहत मंचित इस नाटक से पूर्व रविलाल सांगड़े को शांति वर्धन सम्मान दिया गया।

बेइलाज बादशाह हूं मैं

कहानी में दिखाया गया कि साधु नाम के व्यक्ति को अपनी 4 बीघा जमीन पाने के लिए अर्जी लगानी है। दफ्तरों के चक्कर काटकर जब साधु थक जाता है तो वो अपने परिवार के साथ कचहरी के बाहर पहुंच जाता है। यहां वह कहता है, मैं तो बेइलाज बादशाह हूं। कलेक्टर के पूछे जाने पर वह कहता है 1226/7 नाम है मेरा। अंत में एक दिन उसकी मृत्यु हो जाती है।

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