इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में शैक्षणिक कार्यक्रम करो और सीखो के अंतर्गत ओडिशा के पैडीक्राफ्ट (धान-शिल्प) का प्रशिक्षण ओडिशा से आए पारंपरिक कलाकारों सदाशिव मुंडा और अर्जुन मुंडा द्वारा दिया जा रहा है। ये कलाकार धान से कलाकृति एवं दैनिक उपयोग की चीजों से शानदार शिल्प बनाने में माहिर हंै। ये बिना-छिलका निकले हुए धान को हाथ से बांस की पतली सीक एवं धागों की सहायता से आकार देने में निपुण हंै। इस शिल्प को बनाने के लिए कोई औपचारिक औजार का इस्तेमाल नहीं करते। कच्चे माल के रूप में धान, रंग-बिरंगे धागे एवं बांस की पतली पट्टी उपयोग में लाते हैं। इस शिल्प की पूरी प्रक्रिया में सावधानीपूर्वक धान को बांस की सीक पर एक सीधी रेखा में कसकर बांधते हैं और माला का रूप देते हैं। यह माला लगभग 3 फीट लम्बा होता है और ऐसी 10 माला से एक मूर्ति तैयार की जाती है। अधिकतर गृह-कार्य पश्चात जनजाति महिलाएं एवं बच्चे इस कार्य को करते हैं। चावल समृद्धि का प्रतिनिधित्व करता है, कलाकारों के मध्य देवी लक्ष्मी प्रचलित हैं इसलिए वे उन्हीं की प्रतिमाएं बनाते हैं। हल्के वजन और चटक रंगों से बनी आकर्षक धान-मूर्तियां संस्कृति, समृद्धि की चमक लाती है।
Workshop @ IGRMS
कार्यशाला में प्रतिभागियों ने तीन फीट लंबी धान की माला तैयार कर बनाईं देव प्रतिमाएं।