लों के नगर भोपाल में इन दिनों जलसंकट गहराया हुआ है। बूंद-बूंद पानी के लिए शहरवासियों को रतजगा तक करना पड़ रहा है। शहर के किसी भी इलाके में चले जाइए, आधी रात को भी बर्तन लिए पानी के इंतजार में सैकड़ों लोग कतार लगाए खड़े नजर आ जाएंगे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि शहरवासियों को देर रात पानी की लाइन में खड़ाकर नगर सरकार कुंभकर्णी नींद सो रही है। पानी के लिए हत्या जैसे कृत्य भोपाल के इतिहास के पन्नों पर काले धब्बों की तरह दर्ज हैं। खैर, आपका इन सबसे क्या वास्ता। आपके घर पानी समय से औैर भरपूर पहुंच जाए, इसकी फिक्र करने के लिए मातहतों की फौज है। समस्या तो उन लोगों की है, जो आपको चुनते ही इसलिए हैं कि मूलभूत सुविधाओं के लिए उन्हें परेशान न होना पड़े, लेकिन उन बेचारों की समस्या सुलझना तो दूर बल्कि दोगुनी जरूर हो जाती है। ऐसा नहीं है कि राजधानी में पानी की कोई कमी है। दरअसल, आपका वाटर सप्लाई मैनेजमेंट ही इतना कमजोर है कि पर्याप्त पानी होते हुए भी राजधानीवासी बूंद-बूंद पानी को तरस रहे हैं। हां, आप अपनी नाकामी छिपाने के लिए पूरी बेशर्मी के साथ इतना जरूर कर देते हैं कि बिना किसी को खबर दिए पानी की कटौती शुरू कर देते हैं। जनाब, जिसे आप बेस्ट मैनेजमेंट करार देते हैं, दरअसल वह परेशानी को कई गुना बड़ा बना देता है।
2009 में भी सूखा पड़ने पर शहर में एक दिन छोड़कर पानी सप्लाई करने का निर्णय हुआ था। तब भोपाल में नर्मदा जल की उपलब्धता नहीं थी, लेकिन कोलार और बड़ा तालाब से पानी सप्लाई का संतुलन ऐसा बनाया गया था कि शहर को एक दिन छोड़ पानी सप्लाई होने पर भी हायतौबा नहीं मची थी। अब तो भोपाल में बड़े तालाब के अलावा, कोलार, नर्मदा, केरवा डैम से भी पानी सप्लाई हो रहा है। कई कॉलोनियों में भूजल स्रोत से पानी लिया जा रहा है। इसके बाद भी लोगों का पानी के लिए तरसना नगर निगम के जलकार्य विभाग की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करता है। अब वाटर सप्लाई सिस्टम की हकीकत भी जान लीजिए, यदि श्यामला फिल्टर प्लांट के रिजरवायर को भरते हैं तो कोलार लाइन की टंकियां खाली रह जाती हैं और यदि कोलार की टंकियों को भरने पर फोकस किया जाता है तो यह रिजरवायर खाली हो जाता है। दरअसल खोट प्रबंधन का है। पहले पानी का भंडारण होना चाहिए। इसके बाद सप्लाई। उच्च क्षमता की 65 टंकियां निगम प्रशासन ने बनाई हैं, उनमें से करीब डेढ़ दर्जन का उपयोग ही नहीं हो रहा। वहीं, अंदरखाने की मानें तो जलकार्य विभाग में गिने-चुने लोगों को छोड़कर प्रथम से चतुर्थ श्रेणी तक का अमला शहर के वाटर डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क से अनभिज्ञ है। इसकी अहम वजह वाटर सप्लाई का लाइनवार ड्राइंग का नहीं होना है। इतना ही नहीं, मैदानी अमले को तो ये भी नहीं पता कि वॉल्व की चूड़ियां कहां और कैसी होती हैं। वे तो अंदाज से ही चूड़ियां खोल देते हैं। नतीजा, किसी क्षेत्र में भरपूर पानी पहुंचता है तो कहीं एक बूंद भी पानी नहीं आता। वहीं, लाइन बिछाते समय भौगोलिक स्थिति का ध्यान नहीं रखा गया। न ही व्यवहारिक पक्ष को देखा। इस कारण निचले इलाकों में तो पानी पर्याप्त मात्रा में पहुंच रहा है, जबकि ऊंचे इलाकों में पानी को लेकर हायतौबा मची हुई है।
प्रसंगवश: भोपाल का भूमिगत जल भी खतरे में है। स्वयं प्रदूषण नियंत्रण मंडल की रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। रिपोर्ट कहती है कि पानी में भारी तत्व इस हद तक बढ़ गए हैं कि भविष्य में बाहरी के साथ भूजल उपयोग लायक नहीं होगा। मप्र विज्ञान सभा के एक सर्वेक्षण में भी यही आशंका जताई गई है। रिपोर्ट में बाहरी तथा भूमिगत पानी में आयरन, फ्लोराइड, कॉपर, लेड, नाइट्रेट जैसे भारी तत्वों की बढ़ती मात्रा पर चिंता व्यक्त की गई है। ये अंतरराष्ट्रीय मानक 1.5 मिलीग्राम प्रतिलीटर को पार कर रहे हैं। पानी में इनकी अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकती है। Áअलीम बजमी