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हिंदी ज्ञान मंदिर बंद होने की कगार पर, 35 हजार भी नहीं दे पा रहा भेल

3 वर्ष पहले
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खर्चों की कटौती के नाम पर भेल प्रबंधन

32 साल पुराने हिंदी ज्ञान मंदिर पुस्तकालय को बंद करने पर आमदा है। पिछले दो साल से किताब खरीदने के लिए डेढ़़ लाख रुपए सालाना की राशि भी प्रबंधन ने नहीं दी। अब समाचार पत्र-पत्रिकाओं के लिए हर साल दिए जाने वाले 35 हजार रुपए का बजट भी देने से इनकार कर दिया है। ऐसे में हिंदी ज्ञान मंदिर बंद होने की कगार पर पहुंच चुका है।

इस पुस्तकालय में हर माह ढाई हजार छात्र व अन्य लोग पढ़ने आ रहे हैं। जबकि रोजाना समाचार पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने वालों की भी भीड़ रहती है। दो साल में करीब 22 निर्धन वर्ग के छात्र विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में चयनित हुए हैं। अब भी यहां परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। 20 हजार जो किताबें लाइब्रेरी में हैं, उनमें तकनीक, कानून, साहित्य सहित प्रतियोगी परीक्षाओं में काम आने वाली किताबें हैं। इसके अलावा ओशो, तस्लीमा नसरीन, सलमान रश्दी सहित अलग-अलग लेखकों की किताबें भी उपलब्ध हैं। वर्तमान में हिंदी ज्ञान मंदिर पुस्तकालय के 6 हजार सदस्य हैं। पुस्तकालय के सदस्यों में भेल के रिटायर्ड व मौजूदा अधिकारियाें के अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों की संख्या ज्यादा है।

दो साल पहले... किताबों की खरीदी बंद, अब अखबारों-मैग्जीन का बजट भी रोका

मुनाफे का एक फीसदी किताबों पर खर्च जरूरी

1986 में... हिंदी को बढ़ावा देने के लिए बना था पुस्तकालय

हिंदी ज्ञान मंदिर भेल क्षेत्र की सबसे बड़ी सार्वजनिक पुस्तकालय है। वर्ष 1986 में इस पुस्तकालय को शुरू करने में भेल में काम करने वाले साहित्यकारों का बड़ा योगदान है। इन साहित्यकारों की किताबें भी इस पुस्तकालय में मौजूद हैं। इनमें जाने माने व्यंग्यकार कस्तूरबा अस्पताल से रिटायर्ड हुए डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी, भेल कारखाने से रिटायर हुए विजय जोशी जैसे साहित्यकार शामिल हैं।

भेल प्रबंधन को केंद्र सरकार की राजभाषा कार्यान्वयन समिति के माध्यम से राष्ट्रपति का भी एक पत्र मिला है, जिसमें कहा गया है कि हर साल के होने वाले मुनाफे में से एक फीसदी किताबें खरीदने में लगाना है। इसमें 50 फीसदी से ज्यादा किताबें हिंदी की ही होनी चाहिए। इसके बावजूद प्रबंधन ने किताबें खरीदने का बजट ही रोक दिया है।

कितना बजट मिलता था

1.50 लाख रु. सालाना मिलते थे किताबें खरीदने

सिर्फ... हिंदी की किताबें

इनका तर्क... मुनाफा नहीं हो रहा है इसलिए नहीं खरीद रहे किताबें

राजभाषा अधिनियम के तहत भेल मुनाफे में से किताबोंं की व्यवस्था व राजभाषा को बढ़ाने के लिए कार्य करता है। इस समय आर्थिक स्थिति मजबूत न होने से पुस्तकालय को भेल प्रबंधन राशि नहीं दे पा रहा है। आर्थिक स्थिति सुधरते ही भेल प्रबंधन द्वारा आगामी वर्षाें में इसकी व्यवस्था कर दी जाएगी। राघवेंद्र शुक्ला, अपर महाप्रबंधक भेल

35 हजार रु. सालाना अखबारों के लिए भी नहीं

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