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रमजान व ईद का चांद दिखाई देने पर जमींदार बंदूक चलाते

3 वर्ष पहले
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अलीम बजमी

डॉ. वदुदुल हक सिद्दीकी कॉलेज ऑफ टीचर एजुकेशन के प्रिंसिपल हैं। ये संस्थान मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की एक इकाई है। 65 वर्षीय सिद्दीकी पिछले 7 साल से भोपाल में हैं। अब भोपाल उनके लिए अजनबी शहर नहीं है। उन्हें यहां की आबोहवा खासकर कल्चर बहुत पसंद है। सिद्दीकी रमजान का जिक्र होते ही खुद से जुड़े कई वाकये सुनाते हैं। बताते हैं कि मौजूदा दौर की तरह पहले अलग-अलग रंग और डिजाइन के कपड़े पहनने का रिवाज नहीं था। उनके बचपन में एक ही थान के कपड़े से पूरे घर के कपड़े सिलते थे। इसके लिए टेलर को घर पर ही बुला लिया जाता था। जुमा हो या ईद की नमाज का अवसर, घर के सभी सदस्य बुजुर्गों के साथ नमाज अदा करने जाते। तब घर के बुजुर्ग शेरवानी व साफे बांधे दिखाई देते। रमजान और ईद का चांद दिखाई देने पर गांव के जमींदार बंदूकें चलाते ताकि सभी तक त्योहार की खबर पहुंच जाए। ये रिवायत सिद्धार्थ नगर जिला स्थित उनके गांव बस्ती में वर्ष 1970-72 तक रही। उनका गांव नेपाल बॉर्डर पर है।

डॉ. वदुदुल हक

रमजान-उल-मुबारक का महीना एक-दूसरे की परेशानियों में मदद करने का है। यह बंदों को बेहतर व नेक बनने की शिक्षा देता है। ये नजरिया डॉ. वदुदुल हक सिद्दीकी का है।

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