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सरकार के पास मठ-मंदिरों की प्रॉपर्टी का रिकॉर्ड ही नहीं 61 साल में संपत्ति की गणना तक नहीं कर पाए अफसर

3 वर्ष पहले
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विशेष संवाददाता | भोपाल

धर्मगुरुओं को राज्यमंत्री का दर्जा देने वाली प्रदेश सरकार के पास अपने ही सूबे के मठ और मंदिरों का कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। रियासतों के विलय के बाद प्रदेश में सैकड़ों मठ-मंदिरों का स्वामित्व सरकार के पास आ गया था, लेकिन पिछले 61 साल में सरकार इनकी संपत्ति की गणना तक नहीं कर पाई है। इनकी देखरेख के लिए गठित धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के पास अब तक न तो कोई पूर्णकालिक विभागाध्यक्ष है और न ही विभाग के अधिकारियों के पास बैठने (कार्यालय) की जगह। विभाग का कार्यभार आईएएस अफसर अक्षय सिंह को सौंपा गया है। सहायक संचालक राजेंद्र पवार को भी धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन वे कभी वल्लभ भवन के संस्कृति विभाग में बैठते हैं तो कभी किसी अन्य स्थान पर। अधिकारी कहते हैं कि मठ-मंदिरों के सर्वे और संपत्ति की जानकारी एकत्र करने का काम चल रहा है। हर जिले से इसकी जानकारी मांगी गई है, लेकिन अभी तक कोई भी ठीक-ठाक जानकारी नहीं मिल पाई है।

कवायद... धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग पिछले दो माह से मठ-मंदिरों की संपत्ति पता करने कर रहा है सर्वे
सालों से पुलिस थाने और ट्रेजरी में रखे हैं मंदिरों के जवाहरात
जानकारों के मुताबिक मप्र में मठ-मंदिरों की संपत्ति का मूल्याकंन 50 हजार करोड़ से भी अधिक का है। इनमें जमीनें ही करीब एक-एक हजार एकड़ से ज्यादा हैं। इसके अतिरिक्त बेशकीमती सोना-चांदी और हीरे-जवाहरात तक शामिल हैं। ग्वालियर के नारंगी मंदिर के हीरे जवाहरात वहां एक पुलिस स्टेशन में रखे हुए हैं। इनकी कीमत 50 करोड़ से ज्यादा आंकी गई है। दतिया के हीरा मोहन कुंज मंदिर के हीरे जवाहरात दतिया की ट्रेजरी में रखे हुए हैं, जिनका सालों से आजतक भौतिक सत्यापन नहीं हुआ है। इस मंदिर के नाम भी कई जमीने हैं। इसी नाम से वृंदावन में भी एक मशहूर मंदिर है।

मठ और मंदिरों से जुड़े समस्त काम अभी दूसरे विभागों के पास हैं। हम वह सब काम धार्मिक संचालनालय के अंतर्गत ला रहे हैं। शिफ्टिंग की इस प्रक्रिया में करीब डेढ़ माह का समय लगेगा। इसमें मंदिर और मठ के ट्रस्ट को राशि देना भी शामिल है। इसके लिए सभी जिलों से ऐसे मंदिर और ट्रस्ट की जानकारी मांगी जा रही है। उसके लिए नियमिति वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग हो रही है। पहली कॉन्फ्रेंस में जिलों से अाधी-अधूरी जानकारी आई थी। अब हमने उनसे पूरी जानकारी देने को कहा है। - अक्षय सिंह, संचालक, धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग

50 हजार करोड़ से भी ज्यादा है मठ-मंदिरों

की संपत्ति का अनुमान

परेशानी... विभाग के पास न तो कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष है और न ही अधिकारियों के पास बैठने (कार्यालय) की जगह
प्रॉपर्टी होने पर ही मिलती थी मंदिर बनाने की अनुमति
रियासतकाल में नए मंदिर की अनुमति देने पर रोक लगी हुई थी। उस समय केवल उन्हीं को मंदिर बनाने की अनुमति दी जाती थी, जिनके पास स्वयं की संपत्ति होती थी। उद्देश्य यह था कि जिस मंदिर के पास संपत्ति होगी वहां पूजा होती रहेगी, लेकिन पिछले दो माह से जारी सर्वे में सामने आया कि प्रदेश के कई पुराने मंदिर ऐसे हैं, जिनके पास करोड़ों की संपत्ति है। करीब 4 से 5 जिले ऐसे हैं, जहां रियासतकालीन मंदिर की जमीनें शहर के मास्टर प्लान में शामिल हैं। उन्हें कमर्शियल और आवासीय उपयोग के लिए चिन्हित किया जा चुका है, लेकिन स्पष्ट नीति न होने के कारण उन पर कोई काम नहीं हो पा रहा है।

ग्वालियर रियासत में था धर्मस्व विभाग
ग्वालियर रियासत में धर्मस्व विभाग हुआ करता था। जब रियासत का विलय मप्र में हुआ, उस समय यह विभाग भी मर्ज हो गया। इस विभाग में ग्वालियर के कमिश्नर चेयरमैन और उज्जैन-चंबल के कमिश्नर सदस्य होते हैं, क्योंकि राज्य द्वारा संचालित सबसे अधिक धार्मिक स्थल इन्हीं दो संभाग में हैं। धार्मिक स्थलों पर रिसर्च करने वाले डॉ. एमल दौलतानी कहते हैं कि ग्वालियर जिले में मठ-मंदिरों की संपत्तियों का मूल्यांकन अरबों रुपए में है। अकेले गोहद में ही 200 से अधिक मंदिर हैं। यह मंदिर दो श्रेणियों में ‘औकाफ’ और ‘माफी’ थे। ‘माफी’ की श्रेणी में आने वाले मंदिरों की प्रॉपर्टी मूर्ति की होती है। कलेक्टर उसका संरक्षक होता है। प्रदेश में इनकी संख्या पता लगाने का काम कई बार शुरू हुआ, लेकिन पूरा कभी नहीं हो सका। दूसरी ओर ‘औकाफ’ यानी ट्रस्ट। यह अपने अंतर्गत आने वाले सभी धार्मिक संस्थानों का रखरखाव और पूजा-पाठ सुनिश्चित करता है।

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