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94 मेडिकल छात्रों के एडमिशन निरस्त करने पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य शासन से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट द्वारा निरस्त किए गए 94 मेडिकल छात्रों के एडमिशन के विरुद्ध दायर 25 छात्रों की अपील को स्वीकार कर लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में राज्य शासन के साथ ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और निजी मेडिकल कॉलेजों से जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रकरण को अंतिम सुनवाई पर निर्धारित करते हुए 18 अप्रैल को अंतिम सुनवाई निर्धारित की है। हाईकोर्ट द्वारा गत 23 मार्च 2018 को सत्र 2017-18 में आखिरी चरण की काउंसलिंग में प्रवेशित सभी 94 छात्रों के एडमिशन को निरस्त कर दिया था। छात्रों की ओर से एडवोकेट पीएस पंतवालिया व सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता ने पैरवी की। राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता पुरुषेंद्र कौरव व एडवोकेट सौरभ मिश्रा सुनवाई के लिए उपस्थित हुए।
एडवोकेट गुप्ता ने बताया कि 23 मार्च 2018 को हाईकोर्ट ने उन सभी छात्रों के प्रवेश निरस्त कर दिए थे जिन पर नियमों को ताक पर एडमिशन करने की शिकायत थी। आरोप था कि शासन द्वारा स्थानीय छात्रों की वरीयता को दरकिनार कर राज्य के बाहर के छात्रों को प्रवेश दे दिए थे। प्रवेश रद्द करने का एक अन्य कारण यह था कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा निर्देशों का पालन राज्य शासन द्वारा काउंसलिंग के अंतिम चरण मॉप अप राउंड में प्रवेश के दौरान नहीं किया गया। जिसके कारण कई बेहतर वरीयता वाले छात्र प्रवेश से वंचित रह गए। हाईकोर्ट के इस आदेश के विरुद्ध उन 25 छात्रों द्वारा अपील दायर की गई जिन्होंने भोपाल के पीपुल्स और एलएन मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था।
एमसीआई और निजी कॉलेजों को भी नोटिस
छात्रों द्वारा अपील में यह आधार लिया कि उनको बिना सुनवाई का मौका दिए व बिना पक्षकार बनाए हाईकोर्ट द्वारा उनके एडमिशन निरस्त कर दिए गए जो अवैधानिक है। सभी पक्षों को सुनने के बाद न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबड़े व जस्टिस एल. नागेश्वर राव की युगलपीठ ने इस मामले में राज्य शासन के साथ ही मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया और निजी मेडिकल कॉलेजों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होने के कारण सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल किसी को अंतरिम राहत नहीं दी है।