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रोजा कुशाई के जलसे का खर्च बांंट दिया था मां ने

3 वर्ष पहले
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अलीम बजमी

इच्छाओं का दमन करने और धैर्य धारण करने का नाम रोजा है। यह नजरिया ईएनटी सर्जन डॉ. एसएम मोहसिन का है। वे 40 बरस तक सऊदी अरब में सेवाएं देने के बाद अब भोपाल लौट आए हैं।

68 वर्षीय डॉ. मोहसिन ठेठ भोपाली हंै। वे डॉक्टर बनने के बाद जेद्दा चले गए। अब सिंगारचोली में रहते हैं। भोपाल का जिक्र आते ही आंखें चमक उठती हैं। वे बताते हंै कि वालिद जब इंदौर में इनकम टैक्स अधिकारी थे, तब 8 साल की उम्र में पहला रोजा रखा था। तब वे वहां खान कंपाउंड में रहते थे। इस दौरान इस्लामिया करीमिया स्कूल के टीचर्स तोहफे लाए थे। उनकी रोजा कुशाई बहुत सादगी से हुई। उनकी मां ने इस जलसे का पूरा खर्च गरीब बच्चियों की ईद की खातिर बांट दिया था। इत्तेफाक था कि उनकी वालिदा की पहली रोजा कुशाई में सोने के चम्मच से जमजम पिलाकर कराई गई थी। चांदी के स्टूल पर उन्हें खड़ा किया गया था। मां नजर मोहम्मद खां और नवाब वजीर मोहम्मद खां की पड़पोती होने से बड़ा जलसा हुआ था। वे बताते हैं कि उनके बचपन में ईद के लिए घर-घर में सिवईयां बनती। इसके लिए उन्हें झाड़ियां लाने का जिम्मा सौंपा जाता। खैरात-जकात निकालने के लिए काजी साहब से मशविरा करके फेहरिस्त बनती। अलविदा जुमे की नमाज के पहले इसे तकसीम कर दिया जाता। लेकिन अब ये रिवायत भोपाल में बदल चुकी हैं। बचपन के दौर में भोपाल में चुनिंदा घरों को छोड़कर ज्यादातर घरों में बिजली नहीं थी। इस कारण कैरोसिन का इंतजाम ज्यादा करना पड़ता था। इफ्तार दावत के समय पहली फिक्र रोशनी के इंतजाम की रहती।

डॉ. एसएम मोहसिन

रमजान माह में बड़ी संख्या में बंदे मक्का पहुंचते हैं। मक्का और मदीना की सेहरी और इफ्तारी भोपाल से बिल्कुल अलग है। ये बात ईएनटी सर्जन डॉ. एसएम मोहसिन ने कही।

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