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जनजातियों का गोदना और मान्यताएं बिल्कुल अलग हैं

3 वर्ष पहले
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इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के तहत टैगोर स्कॉलर बसंत निरगुणे द्वारा लिखित पुस्तक \\\"विलुप्त होती जनजातीय गुदना प्रथा\\\' का विमोचन किया गया। बसंत निरगुणे ने बताया कि जनजातियों में विलुप्त होती गोदना-प्रथा पर शोध कार्य करने में प्रमुख जनजातियों गोंड, बैगा, भील, भारिया, सहरिया, कोल और कोरकू को चुना। इसके पीछे सोच यह रही कि इन जनजातियों के गोदना एक-दूसरे से नहीं मिलते हैं। सबके उद्देश्य और मान्यताएं अलग-अलग हैं। शेष जनजातियों के गोदने इन्हीं गोदनों से प्रभावित हैं। गोदनों के अध्ययन के लिए इन सातों जनजातियों के गोदनों से बाहर कुछ भी देखने की आवश्यकता नहीं है। बैगा आदिवासियों के गोदना आदिम (प्रिमिटिव्ह) हैं, जो सहरिया, कोल, कोरकू गोदनों में समय के चिन्ह अंकित हैं, लेकिन यह निश्चित है कि इन जनजातियों में गोदनों की परंपरा भले ही थोड़े रूप में अभी भी जीवित है। इन्हें पुराने और नए रूपकारों-रेखांकनों में ढूंढ़ने की कोशिश की है। उल्लेखनीय है कि बसंत निरगुणे जनजातीय और लोककला परंपरा के श्रेष्ठ अध्येता हैं।

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