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अल्लाह की इबादत और सब्र की तालीम देता है रोजा

3 वर्ष पहले
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अलीम बजमी

68 वर्षीय वसीम अख्तर खाटी भोपाली है। वे विदिशा, झाबुआ और ग्वालियर में कलेक्टर रहे। इसके पहले कुछ वक्त तक भोपाल में अपर कलेक्टर भी रहे। वे भोपाल रियासत के दौर के मशहूर कान्ट्रेक्टर मरहूम इसरार मसूद के बेटे हैं। उनके नाना प्यारे मियां भी भोपाल रियासत के दौर में ठेकेदार रहे हैं। वसीम अख्तर का मानना है कि उनके बचपन में शहर काफी छोटा था। उस दौर में इफ्तार के वक्त ऐसा लगता जैसे कुछ लम्हों के लिए शहर थम सा गया हो। तांगों की टापों की गूंज बमुश्किल सुनाई देती। गाड़ियों का शोर-शराबा नहीं था। जमाना भी सस्ता था। चार या छह आने में बहुत कुछ मिल जाता। शहर में रमजान की रौनक इब्राहीमपुरा से जुमेराती तो बुधवारा से मोती मस्जिद के बीच ही नजर आती। हालांकि उनके बचपन में स्टेट का दौर खत्म हो चुका था। नया हिंदुस्तान और नया भोपाल अंगड़ाई ले रहा था। तब भी रिवायतों पर लोगों का ज्यादा ध्यान था। अब रमजान का चांद देखने के बाद घर-घर जाकर मुबारकबाद देने का दस्तूर खत्म हो गया। पहले के मुकाबले अब मस्जिदों के दालान और छतों पर चांद देखने मर्दों और बच्चों की भीड़ जमा नहीं होती। न ही घरों की छतों पर औरतें जमा दिखाई देती। रमजान या ईद के चांद की सूचना अब सोशल मीडिया से मिलती है। भोपाल में फलों की दुकानें इक्का-दुक्का थी तो इफ्तार दावत की रौनक नुक्ती-खारे और अमरूद की चाट (कचालू) से रहती। इफ्तार से पहले चिंतामन चौक में नमकीन खारे, पपड़ी और इब्राहीमपुरा में नुक्ती लेने वालों की काफी भीड़ रहती। उस जमाने का जायका अब भी जुबान पर हैं। उनके बचपन में भी सेहरी होने तक बाजार खुले रहते तो दिन में चुनिंदा होटलें खुलती रोजे के सम्मान में उनके दरवाजों पर पर्दे लटके रहते। सेहरी में फैनियों का काफी चलन रहा। ये देर रात को दूध में भिगोकर रख दी जाती। उन्होंने जब 12 बरस की उम्र पहला रोजा रखा तो घर में काफी बड़ा जलसा हुआ। इसमें शहर की कई बड़ी शख्सियतें मौजूद रहीं। ईद पर गुरबख्श सिंह हमेशा उन्हें ईदी दे देते। वे इसे आज तक नहीं भूले। सरकारी नौकरी में कभी ऐसा लम्हा नहीं आया कि वो कभी रोजा रखने या तरावीह पढ़ने से चूक गए हो।

वसीम अख्तर

पवित्र रमजान-उल-मुबारक के रोजे अल्लाह की इबादत के तरीकों में से एक है। ये हमें सब्र की तालीम देता है। ये नजरिया मप्र हाउसिंग बोर्ड सेवानिवृत्त कमिश्नर वसीम अख्तर का है।

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