इसका परिणाम भी आशा के काफी अनुरूप रहा और सन् 1938 के उपरांत कई राज्यों में प्रजा परिषदों की स्थापना हुई, जिससे स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक होने में बड़ी सहायता मिली। जहां तक समसामयिक बीकानेर राज्य का प्रश्न था, यहां पर भी सन् 1938 के उपरांत लोगों में जन चेतना का नव संचार हुआ तथा 22 जुलाई, सन् 1942 में रघुवर दयाल गोयल के नेतृत्व में व्यापक जनाधार वाली प्रजा परिषद् की स्थापना हुई।
भारतीय राज्यों में वहां की आम जनता की जनाकांक्षाओं के प्रति रहे कांग्रेस के पूर्व दृष्टिकोण तथा बदले हुए नये दृष्टिकोण को समझने के उपरांत यह समझना भी नितांत ही आवश्यक है कि इन राज्यों की गवर्नमैंट्स का अपनी प्रजा की जनाकांक्षाओं के प्रति क्या रूख रहा? यह एक सच्चाई है कि शुरुआती दौर में कांग्रेस के द्वारा विविध राज्यों में रहने वाली वहां की प्रजा की जनाकांक्षाओं के प्रति जो उदासीनतापूर्ण रवैया अपनाया जाता रहा था, उससे इन देशी राज्यों के शासक और उनकी हुकूमतें काफी खुश थी तथा निश्चिंतता महसूस कर रही थी।
बीकानेर नरेश महाराजा गंगा सिंह के द्वारा सन् 1921 में सेठ जमनालाल बजाज के साथ जो व्यवहार किया गया था, उस गलती को सुधारने के लिए महाराजा ने गांधी जी के खादी तथा चर्खे के प्रचार को शुद्ध रचनात्मक कार्य मान कर उसे प्रोत्साहित करने तक का निर्णय ले लिया था। सन् 1925 में जून के महीने में जब महाराजा गंगा सिंह माउंट आबू प्रवास पर थे तब उनकी वहां पर सेठ जमनालाल बजाज से मुलाकात हुई जो राजाओं के मध्य खादी प्रचार अभियान के अंतर्गत उस समय वहीं पर थे। (लगातार)