यद्यपि, कांग्रेस ने इन उद्देश्यों की प्राप्ति को अपना लक्ष्य तथा कार्यक्षेत्र मान लिया था, तथापि कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां और खतरे भी थे, जिनसे कांग्रेस अपनी आंखें मूंद नहीं सकती थी। कांग्रेस इस बात को लेकर सशंकित थी कि, अगर किसी भी आंदोलन के साथ कांग्रेस का नाम जुड़ गया तो उससे आमजन की अपेक्षाओं में बड़ा ही इजाफा हो जाएगा और यदि किन्ही स्थानीय विवशताओं के चलते वह उन जन अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकी तो जनता में निराशा उत्पन्न हो जाएगी।
जनता के निराश या हतोत्साहित होने का नकारात्मक प्रभाव स्वतंत्रता आंदोलन पर पड़ना सुनिश्चित था। ऐसा होने पर स्वतंत्रता आंदोलन के मार्ग में कठिनाइयां उत्पन्न हो सकती थी।
अत: कांग्रेस की दृष्टि यह बनी कि राज्यों में स्वतंत्रता आंदोलन तभी गति प्राप्त कर सकता था जब स्थानीय नेता अपनी शक्ति राज्यों की अपनी जनता से प्राप्त करें। बाह्य सहायता पर आश्रित नहीं होने से उनमें आत्मविश्वास का बढ़ना भी सुनिश्चित था, जिसे कांग्रेस जरूरी समझती थी। ऐसे परिदृश्य में, कांग्रेस राज्यों में होने वाले आंदोलनों को नैतिक सहायता और सहानुभूति ही दे सकती थी, इससे अधिक कुछ नहीं।
इस निर्णय ने विभिन्न राज्यों में स्थानीय नेतृत्व के लिए मार्ग खोल दिए। राज्यों में स्वतंत्रता आंदोलन को प्रोत्साहन व गति प्रदान करने के लिए संभवत: यही अच्छी नीति थी, जो तत्कालीन परिप्रेक्ष्य की जरूरतों के अनुरूप भी थी।
आने वाले दिनों में इसके कतिपय सकारात्मक परिणाम भी मुखरित होकर सामने आते हुए दृष्टिगत हुए। (लगातार)
राज्यों के आंदोलनों को नैतिक सहायता ही दे सकती थी, कांग्रेस