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इंडियन नेशनल कांग्रेस के दृष्टिकोण में आया परिवर्तन

3 वर्ष पहले
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जहां तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन की नेतृत्वकर्ता इंडियन नेशनल कांग्रेस तथा भारतीय देशी रियासतों के पारस्परिक संबंधों का प्रश्न था, हमें यह देखने को मिलता है कि सन् 1927 से पहले तक इंडियन नेशनल कांग्रेस की नीति भारतीय देशी रियासतों में दखल नहीं करने की रही थी। इस दृष्टिकोण का प्रमुख कारण यह रहा था कि वह अंग्रेजों के विरुद्ध चलाए जा रहे अपने संघर्ष में देशी रियासतों के शासक वर्ग को अपने विरोध में खड़ा करना नहीं चाहती थी। इंडियन नेशनल कांग्रेस तथा भारतीय शासकों के विरुद्ध आंदोलन का खुला समर्थन किया तो वह वर्ग कहीं प्रजातंत्र के मार्ग में रोड़े अटकाने वाला न बन जाए। संभवत: यही कारण था कि महात्मा गांधी के सन् 1920-21 के असहयोग आंदोलन के संदेश को देशी रियासतों में उसकी मुकम्मल स्वरूप में नहीं ले जाया गया।

परंतु सन् 1927 में भारतीय देशी राज्यों में कुछ इस प्रकार की गतिविधियां हुई जिनके परिणास्वरूप इंडियन नेशनल कांग्रेस की भारतीय राज्यों के संबंध में रही उसकी पूर्व नीति में कुछ बदलाव आना प्रारंभ हो गया। वस्तुत: इस समय तक भारतीय राज्यों के शासक अपने अधिकारों तथा आर्थिक सुविधाओं के संबंध में रिपोर्ट देेने के लिए बटलर-कमेटी को नियुक्त कराने में सफल हो चुके थे। इसी समय ‘साइमन कमीशन’ की नियुक्ति भी की गई थी जिसे इस संबंध में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करनी थी कि भावी भारत में और अधिक संवैधानिक प्रगति करने कहां तक आवश्यकता है। (लगातार)

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