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घोड़ा प्रेमियों में सेलिब्रिटी बना ‘अमिताभ’ ख्वाहिश-उसी के बच्चों की मां बने सबकी धन्नो

3 वर्ष पहले
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अमिताभ....अमिताभ...अमिताभ। नाम गूंजते ही टाप सुनाई दी। आवाज की तरफ घूमकर देखा तो खूबसूरत डील-डौल वाला घोड़ा दौड़ा चला आ रहा था। डॉ. शरद मेहता गर्व से कहते हैं-लीजिए, आ गया हमारा अमिताभ। मैं खड़ा हूं खास बनावट और मरुस्थल के प्राकृतिक सौंदर्य को एक दायरे में ही साकार करने वाले बीकानेर शहर से सटे राष्ट्रीय अश्व अनुसंधान केंद्र में। यहां के निदेशक डॉ. मेहता से मिला। वो अमिताभ की खासियत बताते खुद रोमांचित हो उठे। बोले- जो घोड़ों का पारखी नहीं, वह भी एक नजर में ही इस पर फिदा हो सकता है। फिर ज्यों-ज्यों उसकी खूबियां सामने आती गई, उसके बारे में और जानने की उत्सुकता बढ़ती गई। हरकतें सुन हंसी भी आती है।

मसलन-साथी ‘तूफान’ को पहले खाना परोस दें तो अमिताभ मुंह फुला लेता है। लेकिन, ज्यादा देर तूफान नजर नहीं आए तो गर्दन घुमा-घुमाकर तलाशना शुरू कर देता है। दरअसल, केन्द्र के वैज्ञानिकों और घोड़ा प्रेमियों के लिए अमिताभ इसलिए भी खास है क्योंकि वह उस शुद्ध मारवाड़ी नस्ल का घोड़ा है, जो वफादारी-बहादुरी के लिए दुनियाभर में पहचाना जाता है। एक समय में विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके इस नस्ल के घोड़े को देखने आने वाले देशी-विदेशी सैलानी अमिताभ के साथ सेल्फी लेना नहीं भूलते। अमिताभ नाम क्यों दिया? हमारे इस सवाल पर डॉ. मेहता बोले-छह साल के इस घोड़े को सिर्फ लंबाई ही नहीं, हिनहिनाने की मर्दाना आवाज की वजह से यह यूनिक नाम दिया गया है।

बढ़ रहा है कुनबा... कृत्रिम गर्भाधान से 3 बच्चों का पिता बना
ऐसा है अमिताभ
कद : 163 सेंटीमीटर

रंग : गहरा कत्थई (जिसे

डे-कलर कहते हैं)

निशानी : माथे पर लंबा-

सा सफेद तिलक, तीन

पैरों में घुटनों से नीचे के

हिस्सों में सफेदी

इसलिए महत्वपूर्ण मारवाड़ी नस्ल: आकर्षक डील-डौल, युद्ध कौशल में माहिर होने के साथ लंबी दूरी तक बगैर थके दौड़ने वाले बहादुर और वफादार घोड़ों के रूप में मारवाड़ी नस्ल की पहचान होती है। ब्रिटिश काल में यह नस्ल लगभग खत्म होने के कगार पर पहुंच गई। बड़े प्रयासों से फिर पनपी है। शुद्ध नस्ल के इन घोड़ों के एक्सपोर्ट पर कई बंदिशें हैं। सालों तक इसे देश से बाहर ले जाना प्रतिबंधित रहा है। अपनी खासियतों के कारण कई घोड़े समय-समय पर फेमस रहे हैं। इनमें अली बाबा, चित्तौड़ का राजतिलक आदि हैं। राजतिलक का ही वंशज कमल बीकानेर के अश्व अनुसंधान केन्द्र में पला-बढ़ा है। इसे महाराणा प्रताप के चेतक का वंशज भी मानते हैं।

केंद्र में....नस्लों से रूबरू होने के साथ ही सैर-सपाटे का मजा भी
अश्व अनुसंधान केन्द्र को अब पर्यटन के लिहाज से भी विकसित किया गया है। ऑफिसर इंचार्ज डा.शरद मेहता के मुताबिक, लगभग 30 मिनट के भ्रमण में घुड़सवारी के साथ ही खरीदारी और पारंपरिक खान-पान का आनंद भी ले सकेंगे। घोड़ों की नस्लों से रूबरू होने होने का मौका भी इस दौरान मिलेगा।

घोड़ा प्रेमियों के लिए खुशखबरी है। कृत्रिम गर्भाधान से अमिताभ तीन बच्चों का पिता बन गया है। 2 माह के इसके दो बच्चे इसी केन्द्र में पिता को देखकर तौर-तरीके सीख रहे हैं। तीसरा बच्चा बीकानेर के गंगाशहर में पल रहा है। सैलानियों के लिए भी खोले गए इस केन्द्र में हर दिन आने वाले रहे देशी-विदेशी सैलानी अमिताभ से मिलते हैं, उसकी खासियत जानते हैं....और हां-सेल्फी लेना नहीं भूलते। यही वजह है कि मारवाड़ी नस्ल के घोड़ों में विख्यात ‘अलीबाबा’ को अमिताभ की ख्याति टक्कर देने लगी है। चूंकि केन्द्र पर कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा भी है, लिहाजा सभी घोड़ियां पालक चाहते हैं कि उनकी धन्नो बने अमिताभ के बच्चों की मां। यही मंशा लिए कई घोड़ापालक हर दिन इस केन्द्र पर पहुंच रहे हैं।

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