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सािहत्य में उत्तर अाधुिनकता विचार या दर्शन की बजाए होती है प्रवृित्त

3 वर्ष पहले
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साहित्य, पाठक पर केंद्रित और आश्रित रहकर ही अपनी मूल संवेदनाओं को अपने भीतर कायम रखने में सफल हो सकता है। साहित्य में उत्तर आधुनिकता विचार या दर्शन की बजाय एक प्रवृत्ति है। इस प्रवृत्ति को पूरे विश्व ने स्वीकार किया है। साहित्य में उत्तर आधुनिकता और संवेदना के साथ ही पाठक और पाठक की प्रवृत्ति विषय पर केंद्रित ऐसे ही अनेक विचार शनिवार को नगर के युवा और वरिष्ठ साहित्यकारों ने व्यक्त किए। उत्तर आधुनिक साहित्य और मानवीय संवेदना विषय पर मुक्ति संस्थान की ओर से ब्रह्म बगीचा में आयोजित संगोष्ठी के दौरान उत्तर आधुनिक साहित्य के विभिन्न आयामों पर चर्चा करते हुए साहित्यकार राजेंद्र जोशी ने कहा कि साहित्य में उत्तर आधुनिकता वस्तुत: एक नव सांस्कृतिक वाद है, जिसे बहुलतावाद से भी जाना और समझा जा सकता है।

साहित्य में इसके प्रचलन को निजी-जगत के अंत के साथ ही माना जाता है। जोशी ने कहा कि इस वाद के कारण साहित्य में अभिजात्यवादी वर्चस्व के अधिनायकवादी तंत्र को सीधी चुनौती मिली है। विचार रखते हुए उन्होंने उपन्यासकार मधु आचार्य आशावादी के लिखे राजस्थानी के पहले उत्तर आधुनिक उपन्यास गवाड़ का उल्लेख करते हुए कहा कि इस उपन्यास के कारण राजस्थानी साहित्य को विश्व साहित्य में पहचान मिली है। संगोष्ठी के दौरान व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा ने उत्तर आधुनिकता को विचार या दर्शन की बजाय एक प्रवृत्ति बताते हुए कहा कि इस विचार को समूचे विश्व ने स्वीकार कर लिया है। इस मौके पर साहित्यकार मधु आचार्य आशावादी ने कहा कि साहित्य को सदैव पाठक आश्रित रखना चाहिए।

इस दौरान कथाकार राजाराम स्वर्णकार और एड.महेंद्र जैन के साथ ही डॉ.गौरीशंकर प्रजापत ने साहित्य में वाद समय की विशेषता का परिचायक है। संगोष्ठी के दौरान डॉ.नमामीशंकर आचार्य, एन.डी.रंगा, मनोज श्रीमाली ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

ये रहे साक्षी : संगोष्ठी के दौरान चंद्रशेखर जोशी, भगवानदास परिहार, खूमराज पंवार, विष्णु शर्मा, मांगीलाल भद्रवाल, मुरलीमनोहर पुरोहित, हरीश बी.शर्मा आदि मौजूद थे।

मुक्ति संस्थान की ओर से उत्तर आधुनिक साहित्य और मानवीय संवदेना विषय पर आयोजित संगोष्ठी में चर्चा करते साहित्यकार।

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